ग़ज़ल
शराबी से ख़फ़ा होकर ये बेचारी नहीं जाती,
यहां बीवी की शौहर से वफ़ादारी नहीं जाती।
बहुत ननुक़सान करती हैं हमारी फ़स्ल का लेकिन,
हमारे गाओं में चिड़िया कोई मारी नहीं जाती।
ग़रीबी में भी दो रोटी उसे बेशक खिलाते हैं,
कि भूकी गाऐ दादा जी से धुतकारी नहीं जाती।
ज़मीनों के अभी काग़ज़ नहीं फैंके बुज़ुरगों ने,
ज़मीनें खो गईं लेकिन ज़मींदारी नहीं जाती।
दवाओं से फ़क़त मिटती नहीं संगीन होने पर,
बिना तीमारदारों के ये बीमारी नहीं जाती।
वो कोई ग़लती कर दे पर उसी की ओर लेती है,
यहां दादी के पोते से तरफदारी नहीं जाती।
यहां रिश्तों को दौलत के तराज़ू में नहीं रखते,
सुदामा और कृश्ना की यहां यारी नहीं जाती।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
