कविता

शुकराना कीजिए 

शुकराना कीजिए 

थरथराते हाथों को,

डगमगाते पांवों को,

ढलती सांझ को, सखा,

रुसवा न कीजिए।।

फैला बाहों का पलना,

सजाया सौख्य झूलना,

प्यार, दुलार बिछाया,

कृतघ्न न बनिए।।

धुंधली हुई नजर,

कमजोर है शरीर,

सेवा, सुश्रुषा, आदर,

प्रेमभाव राखिए।।

जीवन के शिल्पकार,

हमारे पालनहार,

प्रभु, गुरु, मात-पिता,

शुकराना कीजिए।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८