बेटी है वह इस घर की
“दादी सा, मेरे साथ रसोई घर में आईए ना। मुझे मिठाई बनाना नहीं आता है। राखीपूनम मनाने बाईसा आयेंगे। घर की मिठाई खाने का मजा खूब आता है। मेरा मन है कुछ विशेष बनाऊं। आप बताइए क्या और कैसे बनाऊं।”
” चल बहुरिया, तुम्हार पास ही बैठ जाती हूं।”
दादी सा मीनू को मिठाई बनाना सीखा रहे थे, साथ ही बतिया रहे थे।
” मैं भी अपने भैया-भाभी भतीज के लिए उनकी मनपसंद मिठाई बनाकर ले जाती थी।”
“इतना प्यार से आस्वाद ले लेकर खाते थे सब, मेरा मन तृप्त हो जाता था।”
पीहर हमेशा भरापूरा रहें। हरा-भरा रहें। सुख समृद्धि दिन दूनी, रात चौगुनी बढे। भरभर आशीष देती यादों की गठरी ले मैं भारी मन से ससुराल लौटती। व्याकुल हो जाता मन। माँ की नजरों में भरी प्यार की गागर लगता अब छलकी, अब छलकी। माँ तो रही नहीं, अब भाभी की नजरों में प्यार-दुलार उतर आया हैं।”
” अरे बहुरिया, तुम्हें नहीं जाना है पीहर?”
” दादी सा, मेरे ऋषि भैया विदेश में है और माँ बाबुजी भी कुछ दिनों के लिए उनसे मिलने गए हैं।”
” कोई बात नहीं, अपनी रमा और उमा आ रही है न सपरिवार? उनके साथ धुम-धाम से मना लेना राखी का त्योहार। “
” हां दादीसा, मिठाई, नमकीन, सारे व्यंजन दीदी के पसंद के बनाऊंगी।”
” मैं सूट पीस भी ले आयी हूं।”
“और दादी सा, आपके लिए पूजा की थाली।”
” हां, अब तो प्रभु की भक्ति में ही मन रमता है।”
बातों बातों में मिठाई भी बन गयी। आप चखिए न।”
” नहीं बहू, पहले भोग चढाओ।”
” हां दादी सा, मैं तो भूल ही गयी थी।”
“आपको अब भी पीहर की याद आती है?”
“हां बहुरिया, माँ बाबुजी नहीं रहें। पर भैया भाभी परिवार तो है न? पीहर की गलियां, घर-आँगन, वह आम का पेड, पानी का पंप, सखियों संग घूमना, उछल कूद करना, मीठे-मीठे गीत गाते झूले पर झुलना, कभी भुलाया जा सकता है भला?”
“उम्र चाहे कितनी भी हो, पीहर जाने को उतावला रहता है मन। बचपन लौट आता है। मन मौजी मन ताजातरीन हो जाता है।”
“सुन, बाईसा का हमेशा आदर-सम्मान करना।”
” बेटी है वह इस घर की।”
