मुक्तक/दोहा

मुक्तक

ग़ैरों को मेरी पीर से क्या, दर्द बताना नहीं चाहिये,
अपने कुरेद कर देखेंगे, ज़ख़्म दिखाना नही चाहिये।
कब क्यों कहाँ कैसे पूछेंगे, हमदर्दी जताने से पहले,
दर्द सह लेना, अपनों से मरहम लगवाना नहीं चाहिये।

दौरे मुश्किल में, मुस्कुरा कर चलने की ठान लो,
बाधाओं को राह का अपनी, संगी साथी मान लो।
ठोकर लगे तो शुक्रिया, सँभलकर चलना सिखाया,
सत्य के संग नारायण सदा, परम सत्य जान लो।

अनजान राहों में स्वयं को, मील का पत्थर बना दो,
पीछे आने वालों के लिये, राह को सुगम बना दो।
जब कहीं मन्जिल मिले, विश्राम बस कुछ देर का,
मन्जिल से आगे भी मन्जिल, नयी को लक्ष्य बना दो।

जीने का मकसद न हो, जीने का लाभ क्या?
तन्हाई में घुट- घुट कर, जीने का लाभ क्या?
जियो तो ज़िंदादिली से, मौत हो तो सैनिक सी,
गुमनामी में मर गये तो, जीने का लाभ क्या?

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन