कजरी गाएं, मन हर्षाए
सावन में छन-छन करती हरी-हरी चूड़ियां,
हरी साड़ी के साथ संगत करती चूड़ियां,
हरियल मेंहंदी से जैसे आ जाती लाली-लालिमा,
गोरी को लाज से लाल करती हरी चूड़ियां।
महावर से सजे पांव झंकार करें झांझर से,
चंदा की चंदनिया जैसे मिलेगी वो साजन से,
पवन-हिंडोले में झूलेगी पिया-संग गोरिया,
“हौले से बरसियो” कहेगी सजनी सावन से।
अंबुवा की डार बैठी कूक रही कोयलिया,
अंबर के अंगना में देखो चमके रे बिजुरिया,
पपीहा की पीहू-पीहू मन को है भा रही,
पिया का संदेशा पा कर बाजे रे पायलिया।
हरियाली में हिलमिल गईं हरी-हरी चूड़ियां,
बरस रहा है सावन धरा बनी है दुल्हनिया,
मन की उमंग ढली गीतों-कविताओं में,
कजरी गाएं, मन हर्षाएं हरी-हरी चूड़ियां।
— लीला तिवानी
