कविता

कजरी गाएं, मन हर्षाए

सावन में छन-छन करती हरी-हरी चूड़ियां,
हरी साड़ी के साथ संगत करती चूड़ियां,
हरियल मेंहंदी से जैसे आ जाती लाली-लालिमा,
गोरी को लाज से लाल करती हरी चूड़ियां।

महावर से सजे पांव झंकार करें झांझर से,
चंदा की चंदनिया जैसे मिलेगी वो साजन से,
पवन-हिंडोले में झूलेगी पिया-संग गोरिया,
“हौले से बरसियो” कहेगी सजनी सावन से।

अंबुवा की डार बैठी कूक रही कोयलिया,
अंबर के अंगना में देखो चमके रे बिजुरिया,
पपीहा की पीहू-पीहू मन को है भा रही,
पिया का संदेशा पा कर बाजे रे पायलिया।

हरियाली में हिलमिल गईं हरी-हरी चूड़ियां,
बरस रहा है सावन धरा बनी है दुल्हनिया,
मन की उमंग ढली गीतों-कविताओं में,
कजरी गाएं, मन हर्षाएं हरी-हरी चूड़ियां।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244