लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 16)
निषादराज गुह हाथ जोड़कर बोले- “राजकुमार भरत जी! आप रात्रि को यहाँ सुखपूर्वक रहे हैं न? आपको सेना सहित कोई कष्ट तो नहीं हुआ?”
यह स्नेहमयी बात सुनकर भरत जी ने कहा, “बुद्धिमान निषादराज! हमारी रात्रि बड़े सुख से बीती है। तुमने हमारा बहुत सत्कार किया। अब हमें गंगा पार उतारने की व्यवस्था कर दो, जिससे हम आगे जा सकें।” यह आदेश पाकर निषादराज गुह अपने नगर में गये और अपने भाई-बंधुओं से नौकाओं को घाट पर लगाने को कहा, ताकि भरत जी सेना सहित गंगा जी को पार कर सकें।
आदेश पाते ही मल्लाहों ने लगभग पाँच सौ सुदृढ़ और सुंदर नौकायें तट पर लगा दीं। सभी नौकाएँ कई प्रकार से सुसज्जित थीं, उन पर पताकाएँ और घंटियाँ लटक रही थीं और पहचान के चिह्न बने हुए थे। उनको चलाने के लिए चतुर नाविक बड़ी-बड़ी डाँड़ें लेकर तैयार थे।
एक नौका को स्वयं निषादराज चलाकर लाये थे, जिसमें सफेद रंग की कालीन बिछी हुई थी। उस पर स्वास्तिक का चिह्न अंकित था। उस नौका पर प्रमुख पुरोहितों, भरत जी, शत्रुघ्न जी और सभी माताओं को बैठाया गया। अन्य नावों में सैनिकों और अन्य नागरिकों को बैठाया गया और उनका सामान लादा गया।
सेना में जो हाथी थे वे अपने महावतों को लेकर स्वयं गंगा पार चले गये। बहुत से लोग लकड़ी की डोंगियों या बेडों से और कई लोग तैरकर भी गंगा जी पार कर गये। इस प्रकार रथों को छोड़कर अन्य वाहनों सहित शीघ्र ही सेना सहित सभी लोग गंगा जी के पार उतर गये। रथों को नावों पर चढ़ाकर पार उतारने की आवश्यकता नहीं समझी गयी। इसलिए वे रथ अपने सारथी और घोड़ों सहित शृंगवेरपुर में ही रुक गये। रथों को वहीं छोड़ देने का एक कारण यह भी था कि गंगा पार की रेती में रथों का चलना बहुत कठिन होता है।
सभी लोगों द्वारा गंगा जी को पार कर लेने के बाद उन्होंने प्रयागवन की ओर प्रस्थान किया। निषादराज गुह और उनके कुछ मल्लाह उनका मार्गदर्शन कर रहे थे। माताओं को हाथियों पर बैठाया गया। शेष सभी अपने-अपने वाहन से या पैदल ही चले। गंगा जी की रेती में चलने पर सबको बहुत कठिनाई हो रही थी, परन्तु श्री राम से मिलने के उत्साह के कारण वे चलते गये। शीघ्र ही वे ऋषि भरद्वाज के आश्रम के निकट पहुँच गये।
भरत जी ने ऋषि भरद्वाज के आश्रम के पास पहुँचकर अपनी सेना को आश्रम से कोसभर दूर ही रोक दिया। फिर उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र और राजसी वस्त्राभूषण भी त्याग दिये। उन्होंने केवल साधारण रेशमी वस्त्र धारण कर लिये। तब गुरु वशिष्ठ जी को आगे करके वे पैदल ही आश्रम तक गये। आश्रम में प्रवेश करते ही उन्होंने भरद्वाज जी को देखा और उनके निकट गये।
ऋषि वशिष्ठ को देखकर मुनि भरद्वाज उठकर आगे आये और उनका सत्कार किया। फिर भरत जी ने उनके चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज जी समझ गये कि वे महाराज दशरथ के पुत्र भरत हैं। उनको अपने सूत्रों से अयोध्या के समाचार मिल गये थे। उन्होंने भरत जी का भी उचित सत्कार किया। फिर अयोध्या की कुशल क्षेम पूछी। उन्होंने दशरथ जी के देहान्त का उल्लेख नहीं किया, यद्यपि उनको यह समाचार ज्ञात था। भरत जी ने भी मुनि और आश्रम की कुशल क्षेम पूछी। मुनि ने ‘सब कुशल है’ कहकर उनकी बात का उत्तर दिया। फिर सबको यथायोग्य आसनों पर बैठाया।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 2, सं. 2082 वि. (11 अगस्त, 2025)
