गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सफ़र में जिनके सामान बहुत देखा है
राह में उनको परेशान बहुत देखा है

पहले रहते थे जो घर में बड़ी मुहब्बत से
दरमियाँ उनके घमासान बहुत देखा है

जब वो बतलाने लगे अपने क़दकी ऊंचाई
कहना पड़ा उनसे आसमान बहुत देखा है

ज़रा-सी बात पर औक़ात दिखाते हैं जो
उनका बिकते हुए ईमान बहुत देखा है

इश्क़ है आग का दरिया ये मान लेते हैं
तुझको भी ऐ दिल-ए-नादान बहुत देखा है

— ओम निश्चल