स्वराज की कीमत
भारत की आजादी के जश्न के साथ
एक दर्द भी कौंध जाता है,
लाखों दिलों की चीखें,
घरों का उजाड़ना याद आता है।
वो आज़ादी की खुशी का मंज़र,
जब स्वराज का सूरज निकला,
पर साथ ही फैल गया हर गली में
नफ़रत का घना अँधेरा।
गली-मोहल्लों में थी खून की गंध,
बाजारों में दुकानें लुट गई,
घर हो गए राख के ढेर,
सपनों के मेले में किसी ने
आग लगा दी थी।
कैसी थी वो आजादी,
जो दर्द का दरिया लाई,
एक तरफ़ तिरंगा फहराने का
दिल मचलता था,
दूसरी तरफ लाखों आशियाने की आग
देख आँखें भर आती थीं।
भारत के टुकड़ों में बंटे विस्थापित,
जिनका नाम बन गया—”रिफ्यूजी”,
और जिनसे छिन गई
उनकी पुरानी राष्ट्रीयता।
टूटे ताले, सुलगते घर,
आँगन में बिखरे चूड़ियों के रंग,
पर उन्हें पहनने वाली अब कहाँ थी?
किस दिशा में गुम हो गई थी?
रेल की पटरियों पर
लाशों के ढेर लगे थे,
एक बच्चा माँ की साड़ी का किनारा
पकड़े रो रहा था,
शायद आजादी के मायने
समझने की कोशिश कर रहा था।
सियासत ने नई गद्दियाँ पाईं,
पर सड़कों पर कारवाँ बिखर गया,
मासूम बच्चों का साथ
माँ-बाप के हाथों से छूट गया।
बहनों का सिंदूर
बरसात की बूँदों में बह गया,
माँ भारती की इज्जत हुई तार-तार,
जब नफ़रत की आग में
गाँव और शहर जल उठे।
धन्ना सेठ भी तंबुओं में सोए,
रेल के डिब्बों में
लाशों के अंबार ने
सबको दहला दिया।
हम आज़ादी के गीत गाते हैं,
झंडे लहराते हैं,
पर भूल गए वे लाखों चेहरे
जो अपना घर, अपनी ज़मीन,
अपना सब कुछ छोड़कर आए थे—
सिर्फ़ एक उम्मीद के सहारे,
बस, एक नए कल के भरोसे।
— मुनीष भाटिया
