कहानी – महामृत्युंजय का जाप
महेश और सुरेश दोनों सगे भाई, लेकिन दोनों के व्यवहार में जमीन- आसमान का अंतर! यहां तक की एक तो परिस्थितियों से हल्की सी समझौता कर भी लेता, तो दूसरा , महेश तो चाहिए तो चाहिए , कहीं से भी, कैसे भी, मरने मारने पर उतारू हो जाता। माता-पिता भी उसकी जिद्द देख परेशान हो जाते। उसे समझाने की कोशिश भी करते। मंजिल पाने की जिद्द की सलाह भी देते, लेकिन खाने- पीने में ज्यादा ज़िद अच्छी बात नहीं, लेकिन सच तो यह है कि आखिर वह हो भी क्यों नहीं, पिता की नेतागिरी और फिर जिम्मेदारी ने बचपन से ही सभी को ऐश्वर्या का राज जो सिखा दिया था। मेवालाल जितना खाने- पीने की शौकिन उतनी ही मांस मदिरा का भी शौकीन रहे।
उनकी थाली कभी बिना मांस मदिरा की नहीं सजती। वही रात बिना लाल पानी की कभी नहीं बीतता। पत्नी सोनी भी अक्सर रोकने का प्रयास करती लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं दिखता। यहां तक की मांस की खरीदारी करने तो वह खुद ही निकल पड़ते, जिससे बच्चों का भी वही शौक रह गया। बढ़ती उम्र को देखकर दोस्तों, रिश्तेदारों ने भी उन्हें रोकने की भरपूर कोशिश की लेकिन अपनी शौक के आगे वह कुछ ना मानते। देखते- देखते ही वो कभी शुगर, कभी फैटी लिवर जैसे बीमारियों की शिकार होते गए। डॉक्टर भी साधारण भोजन की हिदायत देता रहा। वक्त के साथ मां ने भी बहुत किफायत करने की कोशिश किया लेकिन बच्चों की जिद्द के आगे वह नतमस्तक हो जाती। दूसरी तरफ परिवार की सारी जिम्मेदारी उड़ान भरी शौक महेश पर आ पड़ी। पिता की अस्वस्थता देख दवाइयां का ढेर लगा रहता। घर परिवार की जिम्मेदारी और अपने शौको के बीच बड़ा बेटा महेश अक्सर दबा रहता, जिसके लिए उसने कुर्बानियों के ढेर पर घर तक को गिरवी रख दिया। इसी बीच पिता की मृत्यु ने परिवार का दम तोड़ दिया और वक्त के साथ ही स्थिति अब यह आ गई थी कि चार लोगों का भोजन कराने वाला घर अब खुद के लिए भोजन इकट्ठा करना मुश्किल हो रहा था। महेश की हालत देख सुरेश अक्सर गुस्से में आग बगुला रहता। वही सोनी अक्सर परेशान सी रहती। तभी एक दिन अचानक पुरोहित जी घर पधारे। प्रवेश करते देख मां लव लबाई आंखों से चरण स्पर्श की ही थी कि—- संभालो बिटिया अपने आप को , वक्त सब कुछ ठीक कर देगा ! पुरोहित शंकर देव जी ने ढांढस बांधते हुए कहा –मैं तो शुरू से ही मेवालाल को खाने -पीने के लिए टोकता रहा लेकिन वह किसी की सुनता ही कहा था।
बाबा वह सुनते तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता। सोनी ने घोर दुख जताते हुए कहा।
“हां , खैर छोड़ो! मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता। सब कुछ ठीक हो जाएगा। पुरोहित जी ने कहा।
बाबा , वही तो नहीं हो रहा है ! हर दिन नया पैगाम, महेश बिल्कुल अपने पिता के रास्ते निकल पड़ा है। घर पर खाने का राशन हो या ना हो , शराब के पैसे आ ही जाते हैं। मेरी तो सुनता ही नहीं है। रोज लड़ाई -झगडे! आंसुओं से भरे दामन ने अपने दुखों का बखान कर दिया।
बिटिया सच कहूं, तो आज इन सब के लिए बहुत देर हो चुकी है। सुनने- सुनाने का वक्त अब हाथ से निकल चुका है। इसलिए तो बच्चों को सबसे पहली संपत्ति मान कर उन्हें जिंदगी के कुछ वर्ष सौंप देने चाहिए। जिससे हमारा आंगन हमेशा के लिए गुलाब के पंखुड़ियां सा खिल उठे, क्योंकि जब वह लाखो कांटों को झेल कर खुशी को प्राप्त करता है उसका मायना ही कुछ अलग होता है। मानव जीवन भी वही है जिसने बचपन में सब कुछ एक हुकुम पर पा लिया, वह भला क्या समझेगा दुनियादारी और पैसों का मोल!
बाबा आपकी बात तो सही है लेकिन इस मझधार मे मैं क्या करूं !
बीटिया,मैं भी क्या बताऊं! मेरे सुझाव से तुम पहले तो नशा मुक्ति दावों का बंदोबस्त करो और फिर भोले बाबा की शरण में जाओ , उनसे दुआ मांगो, प्रार्थना करो, गिड़गिड़ाओ वैसे भी सावन का महीना है महामृत्युंजय का जाप करो सब कुछ ठीक हो जाएगा। वह जरूर तुम्हारी पुकार सुनेंगे। इतना कहते ही पुरोहित जी वहां से उठ आगे की ओर चल पड़े। आशा की नयी किरण लिए सोनी जोर -शोर से काम में लग गयी।
— डोली शाह
