लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 20)
श्री राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी एक ऊँचे शाल वृक्ष पर चढ़ गए और सभी दिशाओं में देखने लगे। उत्तर दिशा में उन्हें एक विशाल सेना दिखाई दी। उन्होंने तुरन्त वृक्ष से उतरकर श्री राम को एक सेना के आने की सूचना दी- ”भैया! मुझे लगता है कि उत्तर दिशा से एक विशाल सेना इधर आ रही है। इस घनघोर वन में सेना के आने का क्या प्रयोजन हो सकता है? मुझे लगता है कि यह सेना हमारा अनिष्ट करने आ रही है। आर्य! अच्छा हो कि अब आप आग को बुझा दें, नहीं तो धुआँ उठते देखकर सेना इधर हमारे आश्रम की ओर ही आ जाएगी। भाभी जी को गुफा में छिपा दें और आप धनुष पर बाण चढ़ाकर तैयार हो जायें।”
तब श्री राम ने कहा- “भाई! इतनी शीघ्रता से किसी निष्कर्ष पर मत पहुँचो। पहले देखो तो यह किसकी सेना हो सकती है? उसके ध्वज आदि से सेना को पहचानने का प्रयास करो।”
श्री राम के ऐसा कहने पर लक्ष्मण जी पुनः शाल वृक्ष पर चढ़ गये और उन्होंने सेना के रथों की ध्वजाओं को ध्यान से देखा और कहने लगे- “भैया! निश्चय ही यह अयोध्या की सेना है। अब पिताजी तो सेना लेकर आ नहीं सकते, क्योंकि उनमें घोष यात्रा करने की शक्ति नहीं रही। निश्चय ही यह कैकेयी का पुत्र भरत है, जो अपने राज्य को निष्कंटक बनाने के लिए हम दोनों को मार डालने के लिए सेना लेकर यहाँ आ रहा है। अब हम दोनों को या तो पर्वत शिखरों पर चलकर छिप जाना चाहिए या कवच और अस्त्र-शस्त्र धारण करके यहीं डट जाना चाहिए। आज मैं सेना सहित भरत का वध करके उसके रक्त से चित्रकूट के वन को सींच दूँगा।”
लक्ष्मण जी रोष के कारण अपना विवेक खो बैठे थे। साथ में विशाल सेना देखकर निषादराज गुह और मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज के मन में भरत जी के प्रति जो आशंका उत्पन्न हुई थी, ठीक वही आशंका वीरवर लक्ष्मण जी के मन में उठी थी। लेकिन श्री राम का अपने भाई भरत जी के प्रति विश्वास इतना प्रबल था कि उन्होंने लक्ष्मण जी की सभी आशंकाओं को तत्काल अस्वीकृत कर दिया।
श्री राम ने लक्ष्मण जी को शान्त करने के लिए कहा- “लक्ष्मण! भाई भरत के मन में कभी भी मेरे प्रति किसी अनिष्ट का विचार नहीं आ सकता। इसलिए तुम्हारी सभी आशंकाएँ निराधार हैं। वैसे भी भरत को मारकर तो मैं सारी पृथ्वी का राज्य भी नहीं ले सकता। इससे संसार में मेरी कितनी निंदा होगी। समुद्र से घिरी हुई यह पृथ्वी मेरे लिए दुर्लभ नहीं है, परन्तु मैं अधर्म से इन्द्र का राज्य भी नहीं लेना चाहता। निश्चय ही भाई भरत हम दोनों से मिलने आये हैं।“
यह सुनकर भी लक्ष्मण जी की आशंका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। वे कहने लगे- ”भैया! यदि पिताजी को या भरत को हमसे मिलने ही आना था, तो साथ में विशाल सेना लाने की क्या आवश्यकता थी? निश्चय ही उनका मन हमारी ओर से शुद्ध नहीं है।“
तब श्री राम ने विश्वासपूर्वक कहा- ”लक्ष्मण! भाई भरत ऐसे नहीं है। जब उन्हें अयोध्या लौटने पर पता चला होगा कि हम तीनों वनवास में चले गये हैं, तो निश्चय ही उनको दुःख हुआ होगा और अपनी माँ के कार्य पर लज्जा आयी होगी। इसीलिए वे हमसे मिलने के लिए आ रहे होंगे। सेना भी केवल अपने दल की सुरक्षा के लिए साथ रखी होगी। प्रिय! निश्चय ही पिताजी या भरत मुझे प्रसन्न करके अयोध्या का राज्य देने के लिए यहाँ आये हैं, परन्तु मैं राज्य नहीं लूँगा। यदि तुम्हें राज्य चाहिए, तो मैं भरत से कह दूँगा कि अयोध्या का राज्य तुम्हें दे दें। मेरे कहने पर वे निश्चय ही ऐसा ही करेंगे।”
श्री राम की बात सुनकर लक्ष्मण जी बहुत लज्जित हुए और कहने लगे- “भैया! लगता है कि पिताजी ही हम लोगों से मिलने आये हैं। जो भी हो अभी कुछ ही समय में पता चल जाएगा कि कौन किसलिए यहाँ आये हैं।”
श्री राम और लक्ष्मण जी आपस में ऐसी बातें कर ही रहे थे कि भरत जी ने अपनी सेना को जहाँ थी, वहीं पर रोक दिया और किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाने का आदेश दिया। फिर वे श्री राम से मिलने की उत्कंठा में सघन वन में घुस पड़े और श्री राम का आश्रम खोजने लगे।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 11, सं. 2082 वि. (19 अगस्त, 2025)
