मोबाइल ने ऐसा चक्कर चलाया
समय का चक्र चला यह कैसा
हर तरफ फैला है उसका जाल
मोबाइल हो गया बहुत स्मार्ट
और आदमी का दिमाग कंगाल
समय देखना घड़ी को भूले
अलार्म जब चाहें बज जाता
दिमाग पर बोझ क्यों डालें जब
जमा घटाना गुना भाग झट से हो जाता
उंगलियों का कमाल है जितना चाहे चलाओ
टाइपराइटर को भूल मन में जो आये लिखते जाओ
कापी पर लिखने की जरूरत नहीं रही अब
जो लिखा है जब चाहे दोबारा पाओ
अब तो उंगली की भी नहीं रही जरूरत
मुंह से बोलकर सब कुछ है लिख जाता
खुशी हो या दुख का हो संदेश
कुछ पल में दुनियां भर में पहुंचाता
फोन नम्बर किसी को याद नहीं
सब यही रखता है अब याद
मोबाइल ने ऐसा चक्कर चलाया
सब रहना चाहते हैं अब आज़ाद
सुबह उठते ही पहले फोन देखना बन गया जरूरी
भगवान को भी अब बाद में करते हैं याद
रिश्ते नातों को भी कहीं का नहीं छोड़ा इसने
सदियों पुराने संस्कार भी कर दिए बर्बाद
— रवींद्र कुमार शर्मा
