किसी राह में किसी मोड़ पर
किसी राह में किसी मोड़ पर
जो टकरा जाओ कहीं अनजान शिलाओं से
या अचानक आ खड़ी हो मौत सामने
जो देती नहीं दिखायी,
जो कहती नहीं कि मैं आ गयी, पर होती है हावी तन पर
तो सुनो, घबराना नहीं ,
स्वयं को तड़पाना नहीं
मानो उसे हमसफ़र।
बने रहना तब शांत, मूक, स्थिर
मन में लिए अटल विश्वास,
थाम आस्था का दामन
दृढ़ इच्छाशक्ति से
और छोड़ देना सब उस अज्ञात शक्ति पर,
किसी राह में किसी मोड़ पर।
जानते हो?
यह वास्तविकता है,
जो मेरे साथ घटी
और मैंने छटपटाते हुए कुछ दिन साँसों की घुटन को सहा।
मैं चली गयी थी उस अनंत छोर तक
जहाँ मेरे जीवन और मृत्यु में
एक बाल जैसी रेखा थी,
और रक्त-स्तर छह तक गिर गया था।
मेरी तड़पन और छटपटाहट को देखा चिकित्सकों ने
फिर भी अदम्य साहस से ज्यों ही मैंने
उस रेखा को छूना था या उस रेखा ने मुझे छूना था,
तड़प – काँप कर वह छोटी हो लुप्त हो गयी,
पहचान गयी वह मेरी सकारात्मकता को।
उसी राह में उसी मोड़ पर
चौदह दिनों – तीस जुलाई से बारह अगस्त तक,
मैंने मौत के ताल में गोते लगाये पकड़ जीवन- रेखा को।
चिकित्सकों ने मौत से बचाया मुझे निष्ठा से,
मेरा नमन उन तक पहुँच पाया।
किसी राह में किसी मोड़ पर
जानती हूँ मैं
जहाँ खड़ी होगी मौत,
वहाँ कोई न बचा पाएगा।
तो जीयो, जीवंतता से जीवनपर्यंत हर राह में हर मोड़ पर,
नित्य मर – मरकर नहीं,
नि:स्वार्थ औरों के काम आकर
औरों को फूलों – सी मुस्कान देकर।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
