बदले हुए तेवर
बदले हुए तेवर है जमाने के
इश्क है बस नाम के अफ़साने में !
ना जरा इंसानियत है बाकी
यही दस्तूर है इस जमाने में !
फरेबी सारे रिश्ते लगते है मुझे
यही हकीकत है हर फसाने में !
कर लूं यकीन मगर किस पर करूं
हम सताऐ है इस जालिम जमाने में !
फलक से तोड तो लाए चांद सितारे
मगर है ये किस काम के जमाने में !
तुम तो मगरूर न होना किसी बहाने से
तुम ही तो इश्क हो मेरे अफ़साने में !
— विभा कुमारी “नीरजा”
