लघुकथा

लघुकथा- कौन अच्छा

“दादा जी, बरसात रुक नहीं रही, बाढ़ आ रही है, हम यहाँ मचान पर बिना खाये-पिये फंसे हुए हैं, अब क्या होगा?”
“कुछ नहीं होगा बचवा, एक बार ऐसे ही पहले भी बाढ़ आई थी. तेरी दादी को तो बहाकर ले गई थी, लेकिन हमें जमीन का अच्छा-खासा मुआवजा मिल गया था!”
“मुआवजा क्या होता बाबा?”
“तू नहीं समझेगा बचवा, पर उसी पैसे से पक्का घर बनवा लिया था!”
“पक्का घर! पर मैंने तो पक्का घर देखा ही नहीं!”
“वो तो तभी बेचकर झुग्गी बनाकर बैठ गए थे, अब फिर बाढ़ उतरेगी तो मुआवजा मिलेगा!”
दादा जी के चेहरे पर तो भूख-प्यास, दुःख-तकलीफ की कोई शिकन नहीं थी, पर भूख-प्यास से व्याकुल पोता समझ नहीं पा रहा था कि बाढ़ अच्छी है या मुआवजा या भूख-प्यास!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244