ग़ज़ल
सब्र कभी जब अपने तेवर बदलेगा
बस्ती से तख़्तो तक मंज़र बदलेगा
कब तक ठहरेगा टूटी झोंपडियों में
आख़िर ड़र भी तो अपना घर बदलेगा
बंद किया जिस दिन हकलाना प्रश्नों ने
घबराकर ज़ालिम भी उत्तर बदलेगा
जिस पल हुंकारों में बदलेंगी आहें
सत्ता के गलियारों का स्वर बदलेगा
जब तंगी आक्रोशित होकर बोलेगी
राजा जनता पर थोपा कर बदलेगा
जब भीतर तूफ़ान उठेगा तब सब कुछ
दाएं बाएं भीतर बाहर बदलेगा
बदलेगा पहले अस्तर इंसां, फ़िर भी
बदबूदार रहा तो बिस्तर बदलेगा
— सतीश बंसल
