पापा हैं वो
नहीं थकते नहीं रुकते,
संघर्ष ही जीवन है कहते।
हर उम्र में इक अलग रूप,
न छांव न देखें कभी धूप।
चलते समय संग कर्मठ,
न हो जीत पर न छोड़ें हठ।
उम्र संग शरीर दुर्बल हुआ,
पर दिखाते कुछ नहीं हुआ।
अभी मीलों पैदल चल सकता हूँ,
अपने काम खुद कर सकता हूँ।
नहीं अभिमान है बस स्वाभिमान,
कुछ सही कुछ ग़लत हैं तो इंसान।
पापा हैं वो इसलिए हमें समझाते,
हमें नुकसान न हो फिक्र वो जताते।
सादा जीवन वो बस जीते हैं हरदम,
खुशियांँ देने को हमें करें अब भी जत्न।
जब तक वो हैं आशिर्वाद रहेगा उनका,
पूछो जिनको नहीं मिलता साथ बड़ों का।
— कामनी गुप्ता
