ग़ज़ल
इस दुनिया में मेरे यार वक्त जिसका बदलता है
उसकी गुफ्तगू का खुद ब खुद लहज़ा बदलता है
जो कहता था न बदलूंगा वक्त कितना भले बदले
वो मुझको देखते ही आजकल रस्ता बदलता है
अभी तो नेक हैं वादे, इरादे और नीयत सब
वक्त ही तय करेगा कौन कब कितना बदलता है
मिले तुमको कोई तुम्हारे जैसा तब समझ आए
कैसा लगता है फिर जब कोई अपना बदलता है
कमा के पैसा उसने नाम सूरत सब बदल डाला
मगर ये सब बदलने से कहां शजरा बदलता है
— भरत मल्होत्रा
