कविता

गज़ल

हर जड़ से उखाड़ गया हूं मैं
ये न पूछ कहां-कहां से निकाला गया हूं मैं !

लोगो ने कहा तेरा नसीब ही खराब है
इस बात की आड में हर जगह वंचित किया गया हूं मैं !

गलती चाहे किसी की भी रही हो
हर बात का जिम्मेवार ठहराया गया हूं मैं !

हौसला तो चट्टान की तरह कर लिया लेकिन
लोगो के आघात से बार-बार टुकड़े- टुकड़े किया गया हूं मैं

खानाबदोश-सी है दर -बदर जिंदगी अपनी
अपनी हर पहचान से महरूम किया गया हूं मैं !

अब न पूछ इस दिल का हाल मुझसे
रोज-रोज ठगा हुआ महसूस किया गया हूं मैं !

— विभा कुमारी “नीरजा”

*विभा कुमारी 'नीरजा'

शिक्षा-हिन्दी में एम ए रुचि-पेन्टिग एवम् पाक-कला वतर्मान निवास-#४७६सेक्टर १५a नोएडा U.P