वृद्ध माता-पिता के प्रति हमारा व्यवहार
क्या वह असली समर्पण है या केवल दिखावा? यह सवाल हर उस व्यक्ति के मन में जरूर आता है जो अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ समय गुजारता है या उनके प्रति कर्तव्य का एहसास करता है। क्या हम वास्तव में उनके लिए दिल से समर्पित हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनकी जरूरतों को समझते हैं, या केवल समाज में अच्छा दिखने के लिए उनके साथ कुछ दिखावटी व्यवहार करते हैं? समर्पण का मतलब है बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के अपने माता-पिता की सेवा करना। उनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सुख को समझना और सम्मान देना। यह समर्पण केवल शब्दों या दिखावे तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनकी छोटी-छोटी जरूरतों पर ध्यान देना, उनकी बात सुनना, उनके साथ समय बिताना और उन्हें प्यार जताना है। अक्सर, परिवार और समाज की अपेक्षाओं से दबाव में आकर हम वृद्ध माता-पिता के साथ केवल बाहरी तौर पर अच्छा व्यवहार करते हैं। मंदिर, मिलन समारोह, रिश्तेदारों के मिलने-जुलने में उनका साथ देते हैं लेकिन असल जीवन में उनकी सांत्वना या सहारा बनने में कंजूसी कर देते हैं। यह दिखावा इसलिए भी होता है क्योंकि हमें लगता है कि इससे हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। हम सभी का जीवन एक चक्र की तरह है — एक समय हम युवा होते हैं, एक दिन वृद्धावस्था में पहुंचेंगे। यदि उस समय हमारे बच्चे हमारे साथ वैसा ही दिखावटी व्यवहार करेंगे जैसा हम करते आए हैं, तो हमारा अकेलापन और पीड़ा कितनी गहरी होगी? यह सोचना जरूरी है कि पिता-माता का सम्मान और सेवा कोई बोझ नहीं बल्कि जीवन का एक पुण्य कार्य है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम निस्वार्थ भाव से अपने बुजुर्गों का साथ दें। उनकी भावनाओं को समझना, उनकी बात ध्यान से सुनना, रोजमर्रा की छोटी-छोटी जरूरतों में उनकी मदद करना, उन्हें अकेला महसूस न होने देना, उनके लिए समय निकालना, स्वास्थ्य और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना और उनके अनुभवों और ज्ञान का सम्मान करना, उनका मार्गदर्शन लेना असली समर्पण के लिए जरूरी है। वृद्ध माता-पिता के प्रति हमारा व्यवहार दिखावे से ऊपर उठकर असली, सच्चे और समर्पित होना चाहिए। आज हम उनके लिए जो करते हैं, वही कल हमें चाहिए होगा। इसलिए अपनी सोच बदलिए और अपने बुजुर्गों के साथ अपने रिश्ते को गहराई से जोड़िए, ताकि आने वाले दिनों में भी हमें वह सम्मान और प्यार मिल सके जो हम आज उन्हें देना भूल रहे हैं। हम सब को याद रखना चाहिए — हम भी एक दिन वृद्ध होंगे, और उस समय हमें अपने बच्चों से वही सहानुभूति और सम्मान चाहिए होगा। क्या हम आज से ही इस बदलाव को स्वीकार करेंगे?
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज
