गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

चल रहे हो जो कँटीली ये डगर हो जाएगी।
तुम हटा दो जो उन्हें तो क्या क़हर हो जाएगी।।

आज जीते हो अभावों में करो मत ग़म कभी।
स्थिति को झेलो गरीबी में बसर हो जाएगी।।

राज़ कितना छुप सकेगा अब क़त्ल का ही बता।
एक दिन तो सुन पुलिस को भी ख़बर हो जाएगी।।

भेदभावों से रहो अब दूर देखो तुम सदा।
अब लगी जो आग तेज़ी से पसर हो जाएगी।।

तुम बखानो ही नहीं जो कर्म तुमने ही किया।
तब तुम्हारी सोच सेवा बेअसर हो जाएगी।।

आशिक़ी में बढ़ चले जो भी कदम हर पल सुनो।
बेवफ़ा वह जो हुई तो कम कसर हो जाएगी।।

अब निभाओ तुम करीबी को जहाँ तक हो सके।
दोस्ती की एक दिन टेढ़ी नज़र हो जाएगी।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’