ग़ज़ल
इल्ज़ाम चोरी के तुम लगाया न करो।
झूठी ऐसी बात तुम फैलाया न करो।।
डायरी मेरी छुपा कहा ले गयीं।
बातें बेवजह यूँ उड़ाया न करो।।
तीर ऐसा छोड़ा जो दिल पे लग गया।
निशाना ऐसा सीधा सधाया न करो।
सच्चाई नहीं जानते बंद रखो मुँह।
झूठे कभी मुँह को तो चलाया न करो।।
चोरी जो नहीं की झुकेंगे न कभी हम।
घमंड में तो रौब तुम जमाया न करो।।
सिध्द करो इल्ज़ाम लगाया जो तुम्हीं ने।
हिम्मत नहीं तो मात ही खाया न करो।।
झूठे ही बने अब तो जाओगे कहाँ।
हार कर सच से तब बिलबिलाया न करो।।
हम तो खड़े हैं सीधे सीना तान कर।
नीचा जो दिखा दिया शरमाया न करो।।
ललकारा ज़मीर को अच्छा नहीं किया।
तैश में आ ज़ुल्म ऐसे ढाया न करो।
कानों को पकड़ लो जिद ऐसी छोड़ दो।
ऊँचे पद पर रह इतराया न करो।।
मालूम है यहाँ तो होती ही फिसलन।
खोदे उन गड्ढों में गिर जाया न करो।।
हमें भी पता था चौकन्ने रहे हम।
तोहमत लगा झूठी खिसियाया न करो।।
मेरी दलीलों से झटका लगा तुमको।
खोज हुआ सच साबित पछताया न करो।।
छोड़ेंगे न हम जो छिछालेदार किया।
बदनामी का ज़हर तो पिलाया न करो।।
डंके की चोट है यह सुन लो मुनादी।
सीधेपन से तुम तो टकराया न करो।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
