गीत/नवगीत

दीपोत्सव-अभिनंदन

तिमिर और दीया लड़ रहे हैं लड़ाई
एक चिंगारी से मात, तम ने है खायी

अंधेरे ने जब कद अपना बढ़ाया
देख जुगनू भी ये हौले से मुस्कुराया
रात काली घिरी ज़िंदगी लड़खड़ाई
भारी उस पर पड़ी एक दियासलाई
जाल अपना अंधेरा बिछाता रहा
मगर आस की ज्योत ना डगमगाई
एक चिंगारी से मात, तम ने है खायी।1।

कालिमा को सजाए अमावस है आती
सितारों से पर वह कहाँ जीत पाती?
सृष्टि निगलने तमस रण सजाता
दिनकर के सम्मुख मगर मुँह छिपाता
रात भर उल्लूओं ने तमाशा दिखाया
भोर होते ही चिड़ियों ने सरगम सजाई
एक चिंगारी से मात, तम ने है खायी।2।

अंधेरे सताएँगे मत हार जाना
दीपक की भाँति सदा जगमगाना
अंधेरे सदा पथ में मिलते रहेंगे
दीप पथ-दीप बनकर जलते रहेंगे
निशा में जो भटकी किश्ती तुम्हारी
दूर ध्रुव ने गगन से मंज़िल दिखाई
एक चिंगारी से मात, तम ने है खायी।3।

वतन के लिए दीप-से जल गये जो
लुटा रोशनी सब अमर बन गये जो
गहनतम तिमिर में खुद को जलाया
पतंगे के जैसे सभी कुछ लुटाया
है शत्-शत् नमन ऐसी चिंगारियों को
कट गये शीश लेकिन ना गर्दन झुकाई
एक चिंगारी से मात, तम ने है खायी।4।

— शरद सुनेरी