कविता

जब चाँद हासिल हो जाता है

जब तक चाँद आसमान में था,
वह सपना था —
हर रात के सन्नाटे में
आशा की एक उजली बूँद-सा टपकता था।

उसकी ओर देख
मन में एक मीठी अधूरी चाह उठती थी —
कि बस एक बार उसे छू लूँ,
अपने हिस्से की रौशनी पा लूँ।

पर जब चाँद पास आया,
जब उसकी ठंडक हथेलियों पर उतरी —
तो लगा, वह भी साधारण है,
थोड़ा रुखा, थोड़ा अधूरा।

अब उसकी चमक में वो मोह नहीं,
वो आकर्षण नहीं,
जिसकी खातिर रातें जागी थीं।
हर खूबसूरती, जब मिल जाती है,
तो अपनी जादूगरी खो देती है।

शायद इसलिए प्रेम दूर से सुंदर लगता है,
और हासिल होकर थक जाता है।
शायद इसलिए
चाँद को आकाश में रहना चाहिए —
और हमें उसकी ओर
सिर्फ़ देखना चाहिए।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh