कविता

खबर नहीं, सौदा है

सच बेच दिया—मोल लगा कर,
कलम टाँग दी दीवारों पर।
अख़बारों की जेबें भारी,
जनता लुटी बाज़ारों पर।

“स्वतंत्र” शब्द अब खोखला-सा,
सत्ता की थाली में परोसा।
जो बोले, उस पर मुकदमे,
जो चुप—वही सबसे रोशनपोशा।

रील बना दो—मुद्दा निपटा,
खबर जली—पर स्क्रीन चमका।
पत्रकार भूखा घूम रहा है,
एंकर का महल नया दमका।

भइया, ये कैसी काली घड़ी?
धन का डेढ़िया सत्य झड़ी।
16 नवंबर सिर्फ़ कहे—
“काग़ज़ की आज़ादी पड़ी पड़ी।”

जब कलम डर कर घर में बंद,
तो लोकतंत्र हुआ पथभ्रष्ट।
कड़वा सच यही लिखा जाए—
सत्ता मोटी—जनता कंगाल,
और प्रेस बनी जब से दलाल।

— डॉ प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh