एक विचारधारा की जरूरत है यहां
नव विचारों में
ताज़ी हवा की ख़ुशबू
उगती भोर है
मन की मिट्टी में
सपनों का बीज गिरा
चुपचाप खिला
दूर क्षितिज पर
बादल की चाल में भी
नई दिशा दिखी
वक्त की धड़कन
कुछ कहने को आतुर
सुन लो उसके स्वर
रात के आँचल
में भी उजली किरणें
पथ दिखा रहीं
शब्दों की लौ से
मन का अँधेरा पिघला
रास्ता खुला
एक सरल कदम
बदल दे मंज़िल का स्वर
नया सफ़र है
विचारों की नदी
धीमे बहते बहते
समंदर बनी
ख़्वाबों की धरती
थोड़ी सी नमी माँगे
फिर हरा भरा
अंतर की आवाज़
सच कहने को उतरे
तुम सुनो ज़रा
रिश्तों की गरमी
पत्थरों को भी पिघला दे
मन का ताप यही
अधूरी बातों
में भी छिपे अर्थ कई
समझो तो सही
— डॉ. अशोक
