यादों का पन्ना – एक लघु उपन्यास
ज़िंदगी की किताब का पहला पन्ना जब मीरा ने पलटा, तो सबसे पहले वही दो दृश्य उभर आए काली जी की भव्य मूर्ति और पुराना आम का पेड़, जिसकी छाँव में समय जाने कब बैठ गया था।
पच्चीस से पैंतीस की उम्र के बीच!!दस साल बीते थे,पर मोहन शायद छह–सात बार ही उस जगह गया था।पर हर बार मीरा तक उसकी आहट पहुँच ही जाती थी। दो परिवार—एक-सा अपनापन। रिश्तों में सच्चाई इतनी कि न कोई रोक, न कोई संकोच।
कुछ भी हो जाता, मीरा बस दरवाज़े से झाँककर कहती,“चल न, ऑफिस छोड़ दे… थोड़ा रोड पर घुमा ला।”मोहन बिना सवाल करे गाड़ी निकाल लेता। उस दिन भी मोहन ने पुकारा“सुन, चल… आज थोड़ा तफ़री करते हैं।”मीरा मुस्कुरा दी। यह मुस्कान सिर्फ़ उसके होंठों पर आती थी, दिल में तो जैसे कोई अनकही बात हवा की तरह उठती-बैठती रहती थी।
जून की दोपहर थी,ऐसी जब हवा भी साँसें गिनकर चलती है।मोहन ने अचानक गाड़ी रोकी।
सामने वही पुराना मंदिर…काली जी की शांत, गंभीर, निहारती हुई प्रतिमा। मीरा ने चुपचाप सुमन अर्पित किए।मोहन भी चरणों में झुका।फिर पता नहीं कैसे उसने काली जी के फ़लक से ज़रा सा सिंदूर उँगलियों पर ले लिया। मीरा हड़बड़ा गई“अरे, ये क्यों लिया? कोई मान्यता होती है क्या?”
मोहन ने बस हल्की-सी मुस्कान दी। उस मुस्कान में कोई जवाब नहीं था बस एक छिपा हुआ कंपन था,जिसे वह खुद भी शायद पूरी तरह नहीं समझता था।
आम का पुराना वृक्ष कुछ दूर बढ़े तो वही पेड़ खड़ा था, शाखों पर जैसे पुरानी यादें झूल रही हों।
“इधर देख,” मोहन ने कहा। “अबे तू भी देख ले न… जी भर कर।” मीरा हँस कर बोली, पर आवाज़ में एक अनजाना स्पंदन था। और तभी मोहन ने उस सिंदूर लगी उँगली से मीरा की माँग भर दी।
दुनिया एक पल को थम गई। समय जैसे हवा रोक कर खड़ा हो गया। मीरा की साँसे अटक गईं, आँखें अपने-आप बंद हो गईं। वह फुसफुसाया“आँखें क्यों बंद की?” मीरा धीमे से “पता नहीं… खुद-ब-खुद हो गईं।” यह ‘खुद-ब-खुद’दोनों के दिलों में कुछ अनलिखा छोड़ गया।
डर, तड़प, और छिपा हुआ सच,सिंदूर की वह हल्की-सी रेखा मीरा के माथे पर सिहर रही थी।
उसने घबराकर दुपट्टा खींच लिया। मोहन ने हाथ बढ़ाया “रुक… मैं साफ़ कर देता हूँ। किसी ने देख लिया तो?”
मीरा ने उसकी कलाई पकड़ ली,पहली बार, बिना सोचे।“नहीं… अभी मत हटाओ।”उसकी आवाज़ काँपी। मोहन थम गया।उसे पहली बार लगा मीरा की चुप्पी में कितनी बातें भटकी हुई हैं।
कुछ देर बाद मीरा ने कहा “अगर तुम हटाओगे… तो लगेगा जैसे यह सब गलती थी।” उस एक वाक्य ने मोहन के भीतर लहरें पैदा कर दीं—जो वह किसी से कह भी नहीं सकता था।
घर के पास पहुँचकर मीरा ने शीशे में खुद को देखा,बाल थोड़े तिरछे किए,एक लट माथे पर गिरा दी ताकि सिंदूर का निशान उसके भीतर की तरह छुपा रहे पर मिटे नहीं।
और सचमुच…किसी ने कुछ नहीं देखा। पर दोनों के भीतरअब बहुत कुछ अनदेखा नहीं रहा था।
मोहन घर का इकलौता लड़का था उसकी शादी की चर्चा शुरू हो रही थी।मीरा कभी नहीं जताती,
पर मोहन की शादी की चर्चाएँ उसे हर रात थोड़ा-सा खाली कर देतीं।तड़प थी, पर वो तड़प कही नहीं जा सकती थी। क्योंकि नाम कभी लिया ही नहीं गया था।
मोहन की शादी हुई—शोरगुल, रस्में, हँसी… पर मीरा की चुप्पी उस दिन सबसे ज़्यादा मुखर थी।
कुछ दिनों बाद मीरा की शादी का समय आया। पंडित ने हथेली देखकर कहा— “इसकी तो पहले शादी हो चुकी है।” मीरा जैसे अंदर तक काँप गई। जो कभी बोला नहीं गया,वह उसकी रेखाओं में कैसे दर्ज हो गया?पर वह कुछ भी कह न सकी।
समय बीत गया,घर, ज़िम्मेदारियाँ, रिश्ते, सब अपनी-अपनी गति से चलते रहे। पर जो एक पल आम के पेड़ तले ठहरा था,वह कहीं नहीं गया।
सालों बाद,एक दोपहर मीरा को वह पुराना बक्सा याद आया।मोहन की माँ ने शादी के दिन
एक फ़ाइल दी थी और बोली “यह मोहन ने दी है,समय मिले तो पढ़ लेना।” मीरा ने फ़ाइल खोली वह डायरी थी,दस वर्षों का उसका मन,उसकी खामोशियाँ,उसकी अनकही तड़प।
हर पन्ना पढ़ते हुए मीरा के भीतर पुरानी रौशनी फिर जल उठी,पर इस बार आँसूओं की धुंध में।
अंतिम पंक्ति में लिखा था— “कभी छूने की चाह नहीं थी…पर जब भी आँखें बंद करता था,तुम भरी हुई माँग में ही दिखती थीं। पता नहीं यह बचपना था या कुछ और कब यह भावना दूसरी दिशा में बह चली समझ नहीं पाया। क्षमा करना,अगर कभी तुम्हें भीतर से चोट पहुँची हो।”
डायरी मीरा की गोद में काँपती रही,मीरा की आँखें बहती रहीं।कहती रहीं बस एक ही बात— “कहा क्यों नहीं…एक बार भी क्यों नहीं?”
कॉल बेल बजी। उन्होंने पूछा—“फिर सूजी हैं आँखें? पापा की याद आई?” मीरा ने सिर हिलाया, पर उसकी खामोशी में पापा नहीं थे।कोई और था…जो कह नहीं पाया, और जिसे वह सुन नहीं पाई।
उस शाम उन्होंने कहा “चलो… घूम आते हैं।” गाड़ी अनजाने में उसी आम के पेड़ के नीचे रुक गई,जहाँ समय ने सालों पहले अपनी साँस रोकी थी। मीरा डायरी साथ लाई थी,पर इस बार इसे छुपाने नहीं,छोड़ आने। उसने डायरी पेड़ के पास रख दी,अतीत को अतीत में लौटा दिया।वर्तमान को अनछुआ रहने दिया।
गाड़ी में कुमार विश्वास की आवाज़ गूँजी— “माँग की सिंदूर रेखा तुमसे यह पूछेगी कल…” मीरा की आँखें झुक गईं।दिल एक बार फिर उस दिन की तरह भर आया।
अगली सुबह बालकनी में वह चाय लिए खड़े थे।नदी रोज़ शोर करती थी,पर आज उसकी ध्वनि
अजीब-सी शांत थी।जैसे किसी अधूरे को स्वीकार कर चुकी हो। मीरा भी शांत थी, पर उसके भीतर एक कोना फिर से धड़क रहा था। जो उस दिन नहीं धड़का था!पर मोहन की डायरी पढ़ते ही चुपके से अपना घर बना चुका था।
ज़िंदगी के सफ़र में कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जो साथ नहीं चलते पर दिल की मिट्टी में अपने निशान हमेशा छोड़ जाते हैं। कुछ पल ऐसे होते हैं,जो लौटकर कभी नहीं आते, पर ख़ामोशी में हर रात वापस आ बैठते हैं।
— सविता सिंह मीरा
