खामोशियां कुछ कहती हैं
पहाड़ी धुंध में
छिपी अनकही बातें
सुनती है पगडंडी
रात की आँचल
धीमे स्वर में गाती
टूटते तारे
चाँद की लकीर
जल में थरथराती
अनकहा सपना
पत्तों की सरसर
चुप रहने के भीतर
गीत जगाती
दूर कहीं पथिक
कदमों की धुन बनकर
संदेश भेजे
मन की थमती
धड़कनों में घुलती
गहरी सन्नाटी
खिड़की के पास
सिसकती एक किरण
बातें लिखती
सूनी राहों पर
कदमों की प्रतिध्वनि
दिल समझाता
फूलों की खुशबू
बिना कहे समझाए
बीते मौसम
खामोशियों का
अपना भी एक स्वर
जो मन सहता
नींद की दहलीज
कानों में रख देती
सपनों की चिट्ठी
— डॉ. अशोक
