गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अब ज़रा- सा कम देखो शीत होना चाहिए।
बोल ऐसे हों कि उनसे मन जीत होना चाहिए।।

खुश करते हैं सभी मन को नगमे मुहब्बत के।
ज़िंदगी में आज ऐसा ही गीत होना चाहिए।।

दर्द सारा ही सुनो अब तकसीम कोई कर दे।
हर पल अब देख लब पर शब्द प्रीत होना चाहिए।।

तन्हाई न मिले कभी सोच लो दिल में सभी।
साथ रहो मिलकर सभी न मन रीत होना चाहिए।।

हो नज़र व नीयत साफ़ लीक सही पर चले।
आदमी का ढंग नहीं पलीत होना चाहिए।

चाल तुम ऐसी चलो कि रास आये ज़माने को।
पुरखों का जीवन समझा दे मीत होना चाहिए।।

कलह करना छोड़ दो रखा क्या ज़िंदगी में।
संग समय सुन लो अच्छा नीत होना चाहिए।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’