कविता

शोक

जब शोक हृदय में बैठ जाता है
चेहरा मुरझा जाता है
मन अति विह्वल हो जाता है
लेकिन इस शोक से लड़ना पड़ता है
लड़-लड़कर जीना पड़ता है ।

है सत्य मृत्यु
सच कह गया कहने वाला
बच सका न आज तक कोई
फिर मृत्यु शोक करना ही क्यों
है कौन प्राणी जगत में ऐसा
जिसका मृत्यु से पड़ा न पाला ।

भ्रमवश झूठ को जब सच समझा जाता है
ईश्वर से विश्वास डगमगा जाता है
कुछ जाने- अनजाने पाप उदय हो जाते हैं
आत्मा पर अंधकार का पर्दा गिर जाता है
मन अंधकारमय हो जाता है
तब शोक हृदय में छा जाता है ।

राम-कृष्ण, गौतम -रहीम सबने सही मृत्यु
जग को दिया बोध बुद्ध ने
जो आया है वो जाएगा
नित्यानित्य ज्ञान ही है
आत्मज्ञान और शोक मुक्ति का उपाय ।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111