कविता

प्राण के इस पट रहा मैं! (मधुगीति 251219) 23:35

प्राण के इस पट रहा मैं,
प्राण के उस पाट तुम;
त्राण के इस तट रहा मैं,
त्राण के उस घाट तुम!

मैं रहा साकार हूँ,
औ निराकारी तुम रहे;
महाकाशों से घिरा मैं,
तुम चिदाकाशी रहे!

अरुणिमा की गोद मैं,
तुम नीलिमा नभ की रहे;
शिखा मैं देखे रहा,
तुम महास्रोतों से घिरे!

सनातन से मैं निःसृत,
तुम सगुण निर्गुण से निभृत;
आयतन में मैं घिरा,
तुम कायनातों से परे!

खेलता क्षणिका से मैं,
तुम अट्टहासों अधर के;
‘मधु’ अधर मुरली तुम्हारी,
गीति मेरी गाये तुम!

— गोपाल बघेल ‘मधु’