ग़ज़ल
मुश्किलों से गुज़र गया कब का,
वो यकीनन निखर गया कब का।
राह बाकी नहीं न मंज़िल है,
हाथ से ये सफ़र गया कब का।
हारकर ज़िंदगी से जो बैठा,
वो समझिये कि मर गया कब का।
दर्द दिल का हमारी आंखों से,
अश्क़ बनकर के झर गया कब का।
शायरी की हमारी पुस्तक को।
एक चूहा कुतर गया कब का।
झूठ बनके जो दिल में उतरा था,
वो नज़र से उतर गया कब का।
कोई जिसको न कर सका अब तक,
काम जय वो ही कर गया कब का।
— जयकृष्ण चांडक ‘जय’
