ग़ज़ल
कई बार छत पर भी जाना पड़ा है,
कि इक भारी कपड़ा सुखाना पड़ा है।
मैं जब तेरी मूरत बनाने चला तो,
कई बार इसको गिराना पड़ा है।
बहुत भीड़ में मैंने सामान खोया,
यहां पहले ख़ुद को बचाना पड़ा है।
कि हम ज़िंदा होकर भी ज़िंदा नहीं थे,
यहां ख़ूद को मुरदा दिखाना पड़ा है।
मकां खूबसूरत बनाना था लेकिन,
इसे सिर्फ़ पुख़्ता बनाना पड़ा है।
जहां से हटाई थी तस्वीर तेरी,
इसे फिर वहीं पर लगाना पड़ा है।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
