ग़ज़ल
वक्त के वार को आजमाते रहे,
सह गये हर सितम मुस्कुराते रहे।
जिन्दगी ने जहर, जो दिया पी लिया,
हौंसलो से नया रण सजाते रहे।
जीत कर भी उन्हे हार ही तो मिली,
देशवासी उन्हे जब भुलाते रहे।
सोचिए जां शहीदो की कैसे गई
जो अना के लिए जां गवाते रहे।
भूख से,प्यास से, वो तड़पते रहे,
गान फिर भी धरा का ही गाते रहे।
— शालिनी शर्मा
