नव संवत्सर वर्ष
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को, छाया नूतन हर्ष।
नई चेतना दे रहा, नव संवत्सर वर्ष।
नृपति विक्रमादित्य से, ‘विक्रम संवत’ नाम।
उज्जयिनी में शकों पर, पायी विजय ललाम।
शुभारम्भ नवरात्र का, व्रत नव दुर्गा – शक्ति।
नव स्वरूप की हम करें, अनुष्ठानमय भक्ति।
सृष्टि – सृजन का आ गया, मंगलमय नव वर्ष।
विक्रम संवत नाम से, देता नव उत्कर्ष।
हम पौराणिक आदि से, क्यों मानें इतिहास।
उच्च हिमालय है पिता, माँ गंगा जी पास।
सतयुग आरम्भिक दिवस, जगी साधना – शक्ति।
विश्व सुमंगल के लिए, नव दुर्गा की भक्ति।
एक जनवरी को भला, कैसा नूतन वर्ष।
ऋतु – गति बदली ही नहीं, चले शीत संघर्ष।
चंद्र – सूर्य गति से मनें, भारतीय त्यौहार।
राखी,होली ,पूर्णिमा, तिथियाँ ऋतु अनुसार।
ब्रह्मा ने घोषित किया, तिथि प्रतिपदा महान।
सर्वश्रेष्ठ तिथि मानकर, दिया प्रवर सुस्थान।
सत्य, सनातन, शाश्वत, गणना काल प्रमाण।
नव संवत्सर का उदय, भर दे ऊर्जा – प्राण।
साधारण ‘न्यू ईयर ‘है, कल्पित गणना- काल।
संवत्सर देता हमें,प्रामाणिक ग्रह – चाल।
नव संवत को मान लें, ज्यों वैश्विक नववर्ष।
पूर्वजों की खोज को, मिले नवल संदर्श।
अँग्रेजी नववर्ष से, कोई नहीं दुराव।
पर हम हिन्दू वर्ष से. रखें विशेष लगाव।
भारतीय तिथि – वार को, लगे भूलने लोग।
गति, मुहूर्त, पंचांग का, अनजाना ग्रह – योग।
नव संवत्सर का करें, हम स्वागत – सत्कार।
नीराजन – पूजन हमें, देगा खुशी अपार।
चैत्र मास में प्रकृति का, निखरे रूप अनूप।
पत्र, पुष्प, फल से लदे, तरु बन जाते भूप।
स्वागत हित नववर्ष में, पके फसल सोल्लास।
सर्वोत्तम है चैत्र सम, और कौन – सा मास।
रचें रँगोली, स्वास्तिक, लें सँवार घर – द्वार।
लिखें ऊँ, शुभ – लाभ शुचि, बाँधें वंदनवार।
नव संवत शुभकामना, देवें परिजन – मित्र।
नव पीढ़ी का ज्ञान से, होवे भाव पवित्र।
भगवा ध्वज फहरे रुचिर, छत,मंदिर ,बाजार।
करें मदद, संकल्प लें, चुन निर्धन परिवार।
बच्चों को समझाइए, नव संवत्सर ज्ञान।
भारतीय संस्कार की, शुभ परम्परा महान।
हिन्दू नूतन वर्ष का, चलो मनाएँ पर्व।
बच्चों को प्रेरित करें, मन में भर दें गर्व।
बनें आज की बेटियाँ, साहस, शक्ति प्रतीक।
सबलारूपी देवियाँ, तजें न संस्कृति – लीक।
माँ दुर्गा नवरात्र का, पावनतम संदेश ।
नारी का सम्मान हो, बने दिव्य परिवेश।
मंगलमय नववर्ष हो, सबका हो कल्याण।
रोग, शोक, अज्ञान से, मिले सभी को त्राण।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
