कविता

मेरे अपने कुछ पल

मेरे जीवन के कुछ क्षण,
हो जाती हूँ तुझमें मगन,
खो जाती हूँ इस कदर
कि तू ही बन जाता है
मेरा अभिन्न अंग।

पँछियों का यूँ चहचहाना,
मेरी देहरी तक आ जाना,
जैसे मेरे मन की थकन
पहचान कर
चले आते हों।

मन की अनकही अवस्थाएँ,
मौन में सिमटी भावनाएँ,
वे जैसे सब समझ लेते हों
बिना प्रश्न किए
सिर्फ़ बोलते हों।

उनकी मीठी वाणी सुन
मन का बोझ
किसी अनदेखे स्पर्श सा
हल्का हो जाता है।
कुछ पल के लिए
मैं स्वयं से दूर,
उनकी ध्वनि में
पूरी तरह खो जाती हूँ।
तब लगता है कि
वे जीने का संदेश लेकर आए हैं,
कहते हैं धीमे स्वर में
“मत होना कभी उदास,
हम हैं न,
यहीं कहीं आसपास।”

सुन चिरैया,
तू यूँ ही चहचहाती रहना,
ताकि जीवित रहे संवेदना।
शायद तू
किसी अदृश्य शक्ति की
सशक्त चेतना हो।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com