दृष्टि और सृष्टि का संतुलन : सामाजिक शुद्धि की अनिवार्य शर्त
समाज में बढ़ती सामाजिक विकृतियों पर चर्चा करते समय अक्सर दृष्टिकोण एकतरफ़ा हो जाता है। कहीं पुरुष की मानसिकता को पूर्णतः दोषी ठहरा दिया जाता है, तो कहीं स्वतंत्रता के नाम पर हर सामाजिक प्रश्न को अनदेखा कर दिया जाता है। किंतु कोई भी सामाजिक समस्या केवल एक पक्ष से उत्पन्न नहीं होती। उसका निर्माण अनेक कारकों के सम्मिलित प्रभाव से होता है। यदि समाधान चाहिए, तो “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि” के साथ-साथ “जैसी सृष्टि वैसी दृष्टि” पर भी समान गंभीरता से विचार आवश्यक है। हम स्त्री को सृष्टि मान लेते हैं और वो है भी उसका पुरुष से भी बड़ा योगदान है सृष्टि निर्माण में और नवीनीकरण में। और दृष्टि पुरुष की मान लेते हैं और एक सकारात्मक विचार लेकर चर्चा करते हैं।
स्त्री को सृष्टि कहना केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है। वही जीवन को जन्म देती है, वही उसका पोषण करती है और वही मनुष्य की पहली पाठशाला होती है। यह पोषण केवल भोजन तक सीमित नहीं रहता — यह संस्कार, दृष्टिकोण, संवेदना और मर्यादा का भी निर्माण करता है। जिस स्तन से नवजात जीवन पाता है, वही सामाजिक प्रभावों के कारण आगे चलकर कामुकता का विषय बन जाता है। यह परिवर्तन प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक है। यह इस बात का प्रमाण है कि दृष्टि वातावरण से निर्मित होती है।
आज के समय में जब मीडिया, फैशन और बाजार संस्कृति शरीर को प्रदर्शन और उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तब कमजोर संस्कार वाला मन उससे प्रभावित होता है। यहाँ “जैसी सृष्टि वैसी दृष्टि” का सिद्धांत कार्य करता है। दृश्य मन को दिशा देते हैं और बार-बार देखा गया व्यवहार धीरे-धीरे मानसिकता में बदल जाता है।
परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आकर्षण अपराध नहीं है। अपराध तब जन्म लेता है जब संयम, नैतिकता और आत्मनियंत्रण टूट जाते हैं। इसलिए अपराध की जिम्मेदारी सदैव अपराधी की ही रहेगी। किंतु केवल दंड और दोषारोपण से समाज शुद्ध नहीं होता। कारणों का विश्लेषण और उनका निवारण आवश्यक है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब किसी पुरुष की मानसिक उत्तेजना किसी अन्य वातावरण से उत्पन्न होती है, किंतु उसका शिकार कोई कमजोर, असुरक्षित और निर्दोष स्त्री बन जाती है। यहाँ प्रश्न दोष का नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का है। यदि स्त्री स्वयं सृष्टि की निर्माता है, तो उसके आचरण, प्रस्तुति और सामाजिक संदेश का प्रभाव समाज की मानसिकता पर पड़ता है। यह अधिकारों का हनन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण चेतना का विषय है।
*सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का पक्ष*
यदि कोई आधुनिक महिला केवल यह कह दे कि “जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि” और इसके दूसरे पहलू “जैसी सृष्टि वैसी दृष्टि” पर विचार ही न करे, तो यह सामाजिक जिम्मेदारी से भागने के बराबर है।
– समाज में सृष्टि केवल शरीर या स्वतंत्रता नहीं है; वह पहली पाठशाला है, जीवन और मानसिकता का पोषण करती है।
– संवेदनशील होना इसका अर्थ है कि व्यक्ति यह समझे कि उसका आचरण, प्रस्तुति और व्यवहार समाज पर प्रभाव डाल सकता है।
– केवल अधिकारों और स्वतंत्रता का दावा करना, और सामाजिक प्रभाव की जिम्मेदारी से विमुख रहना, असंवेदनशीलता की पहचान है।
सत्य यह है कि अपराध की जिम्मेदारी अपराधी पर ही रहेगी, लेकिन समाज में विकृति को रोकने और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए सभी को अपने-अपने प्रभाव और जिम्मेदारी को समझना जरूरी है।
*विवेक और संयम की भूमिका*
– स्त्री का विवेक कहाँ होना चाहिए?
1. जीवन देने के साथ जीवन का संस्कार भी देना।
2. बेटे को स्त्री के प्रति सम्मान और मर्यादा सिखाना।
3. सार्वजनिक व्यवहार में सामाजिक प्रभाव की चेतना रखना।
4. शरीर को केवल प्रदर्शन नहीं, गरिमा का प्रतीक बनाना।
5. स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का संतुलन बनाना।
6. संस्कृति और आधुनिकता के बीच विवेकपूर्ण संतुलन रखना।
– पुरुष का संयम कहाँ होना चाहिए?
1. दृष्टि को वस्तुकरण से बचाना।
2. आकर्षण और आचरण के बीच मर्यादा रखना।
3. स्त्री को व्यक्ति के रूप में देखना, उपभोग की वस्तु नहीं।
4. उत्तेजना को विवेक से नियंत्रित करना।
5. शक्ति नहीं, संवेदनशीलता को पुरुषार्थ बनाना।
*समाज की सामूहिक जिम्मेदारी*
1. संस्कार-आधारित शिक्षा।
2. मर्यादित मीडिया संस्कृति।
3. निष्पक्ष कानून व्यवस्था।
4. खुले और स्वस्थ संवाद।
समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं है। समाधान संवाद, संतुलन और सामूहिक आत्मचिंतन में है। शिक्षा केवल जानकारी नहीं दे, चरित्र गढ़े। स्वतंत्रता अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी सिखाए। मीडिया केवल आकर्षण न बेचे, मूल्य भी गढ़े।
अंततः समाज की शुद्धि तभी संभव है जब सृष्टि विवेकशील हो और दृष्टि संयमित। यही संतुलन एक स्वस्थ, सुरक्षित और संस्कारित समाज की वास्तविक पहचान है।
— जितेंदरपाल सिंह
