जीवन-यथार्थ के विविध रंगों का प्रिज़्म कहानी संग्रह-” नियति का जंगल”
“नयनों के तले कल्पनाओं का विशाल आकाश है जिसमें मन रूपी पाखी निरंतर विचरण करता रहता है और पल प्रतिपल इस आकाश की चरम सीमा को छूने के लिए प्रयास रहता है मां के पाखी के संघर्ष को शब्दों में पिरोने का सतत प्रयास किया है और इसके परिणाम स्वरूप मेरा प्रथम कहानी संग्रह ‘नियति का जंगल’ आपके हाथ में है”
ये शब्द हैं ‘नियति का जंगल’ कहानी संग्रह की कहानीकार आदरणीय अर्पणा धीमान के।
इस कहानी संग्रह में उन्नीस कहानियां संग्रहीत हैं। एक सौ साठ पृष्ठों का यह खूबसूरत कहानी संग्रह बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है।
साहित्यिक विधाओं में कहानी एक खूबसूरत विधा है जिसमें रचनाकार अपने कथ्य से तथ्य तक, परिवेश समाज और काल व विभिन्न परिस्थितियों इत्यादि का सूक्ष्म अवलोकन व विश्लेषण करते हुए पाठकों को अपनी कला से आकर्षित ही नहीं करता उनका ज्ञानवर्धन भी करता और वैचारिक पोषण भी ।
हस्तगत कहानी संग्रह’ नियति का जंगल’ की पहली कहानी “ठूंठ ” है। इस कहानी में डॉक्टर प्रशांत बचपन से ही थर्ड जेंडर है। इस बात की जानकारी सिर्फ उसकी मां को है। उसका घर में ही पालन पोषण होता है और वह एमबीबीएस डॉक्टर बन जाता है । एक दिन उसके क्लीनिक में मालती नामक युवती अपना अबॉर्शन करवाने आती है जिसके साथ उसके रिश्तेदार ने ही दुष्कर्म किया है।
यहीं दोनों आपस में मिल जाते हैं और दोनों एक दूसरे का सच जानते हुए एक दूसरे को अपना लेते हैं, जैसे एक ठूंठ को एक हरी बेल । मालती के उस अवैध बच्चों को डॉक्टर प्रशांत अपना नाम देता है और एक दिन वह बेटा भी एमबीबीएस पास करके डॉक्टर बन जाता है। कहानी का सुखद अंत पाठक को एक खूबसूरत संदेश देता हुआ सुखद अनुभूति देता है। यही इस कहानी का साध्य है।
संग्रह की दूसरी कहानी “दो बूंदें” है। यह कहानी एक ऐसी गर्भवती महिला की कहानी है जिसकी सौतेली मां साजिश के तहत एक युवक के साथ यह कहकर उसकी शादी कर देती है कि वह हिमाचल में मकान बनाने का ठेका लेता है। एक महीने के बाद वह युवक उसे गर्भवती छोड़कर भाग जाता है।फिर देवर उसे बहला-फुसलाकर उसके पति को हिमाचल में ढूंढने के बहाने बिहार से दिल्ली ले आता है । दिल्ली में जब उसका सौदा होने लगता है तो वह सुन लेती है और फिर वह वहां से भाग कर बिहारी मजदूरों के साथ हिमाचल में आ जाती है। यहां एक बच्चे को जन्म देकर बिहारी मजदूरों के साथ मजदूरी करने लगती है यह कहानी भी संवेदना से भरपूर है तथा समाज में नारी के प्रति दृष्टिकोण व नारी जीवन की विडंबनाओं को बखूबी उद्घाटित करती है ।
पाखंड धर्मभीरु व्यक्तियों का शोषण कभी रूढ़ियों के नाम पर तो कभी परंपरा के नाम पर सदियों से करता आया है और आज भी हो रहा है । अंधविश्वास कल भी था और आज भी है इसी तथ्य की परिपुष्टि करती कहानी “गौहत्या” पाखंड के शोषण चक्र को बेनकाब करती है।
कभी ज़रूरतें तो कभी हालात एक महिला को किस तरह गहरी खाई में फेंक देते हैं और जहां से वह चाहकर भी बाहर नहीं निकाल पाती इस थीम पर लिखी कहानी ‘जर्द पत्ते’ एक एड्स मरीज की कहानी है जो हालात कि मारी घर की दहलीज से निकल आती है और फिर मुड़कर वापस नहीं जा पाती और अंत में अस्पताल में एड्स से लड़ते हुए उसकी मृत्यु हो जाती है। नारी जीवन की विडंबनाओ से भरी यह कहानी भीतर तक भिगो देती है। “आजीवन कारावास” जानकी नामक लड़की की कहानी है, जिसके साथ बचपन में बलात्कार होता है। वह इस बलात्कार की पीड़ा को समाज में भोगते हुए बड़ी होती है ,पढ़ती लिखती है और एक दिन बैंक में नौकरी करने लगती है। परंतु उसका अतीत वहां भी पहुंच जाता है । फिर वह फिर एक दिन अंतर्जातीय विवाह कर लेती है। परंतु उसके माता-पिता समाज के डर से बेटी के इस विवाह को स्वीकार नहीं करते हैं और अंत में अपना घर और माता-पिता भी जानकी को त्यागने पड़ जाते हैं । यह एक जानकी की नहीं हजारों जानकियों के अंतहीन वनवास की कहानी है । समाज की कई रूढ़ियों का पटाक्षेप करती यह संग्रह की खूबसूरत कहानी है।
बचपन के प्यार की खूबसूरत अनुभूतियां लिए “बचपना” कहानी खूबसूरत बन पड़ी है। यह अमीर और गरीब के बीच की प्रेम कहानी हमेशा की तरह अधूरी रही है।
‘मसाण’ कहानी भी एक प्रेम कहानी है जिसमें प्रेमी अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिबेदी पर अपने प्रेम को चढ़ा देता है। परंतु अंत में वही प्रेम फिर उसकी झोली में आ जाता है।
खूबसूरत अंत लिए यह कहानी भी बहुत अच्छी बन पड़ी है।
“देहविहीन ” कहानी देह से मुक्त हुई एक आत्मा जो अखरोट के पेड़ पर बैठकर अपनी मृत्यु का तमाशा देख रही है।
आज उसे अपने जीवन में किए हुए कुकर्मों के लिए पछतावा हो रहा है परंतु हासिल कुछ भी नहीं है। संवेदना के स्तर पर यह कहानी भी खूबसूरत है।
“फूल ” कहानी मलिक का लड़के और घर के ड्राइवर (जिसकी मृत्यु हो जाती है) की लड़की से शुरू होती है। दोनों का सामाजिक रुतबा और जातियां अलग-अलग हैं ।ऊंच- नीच, गरीब – अमीर की खाइयों को फलांगती हुई यह कहानी अंत में दोनों के मिलन से समाप्त होती है। यहां कहानीकार का कहना है -“फूल तो फूल होते हैं फूलों की कोई जात नहीं होती, उनका मकसद तो मुस्कुराहट खुशबू और खुशी बांटना है। फिर चाहे वे जंगल में खिलें या पहाड़ पर या बगिया में।
यह कहानी भी मर्म को छूती है।
कहानी “स्याह जिंदगी” एक ऐसी लड़की की कहानी है जो पांच बहनों में सबसे बड़ी है पिता पहले स्वर्गवास हो गए हैं और मां16 साल की उम्र में ही किसी दूर के रिश्तेदार के कहने पर उसकी हरियाणा में शादी कर देती है। शादी के नाम पर यह उस 16 साल की बच्ची के साथ धोखा था ,और फिर ससुराल की यातनाओं से गुजरते हुए जब उसे ब्लड कैंसर हो जाता तो सास उसे सरकारी अस्पताल में फेंक कर बेटे के पास बैंगलोर चली जाती है । मां अपनी बेटी को ढूंढते हुए हरियाणा जाती है और अपनी बेटी को अस्पताल से घर ले आती है। कुछ समय बाद लड़की इस दुनिया से विदा हो जाती है। ऐसा धोखा हिमाचल की एक लड़की के साथ नहीं कई लड़कियों के साथ होता है कभी एन आर आई के नाम पर तो कभी किसी और नाम पर ।
सवि उसकी बचपन की सहेली उसकी व अपनी डायरियों की शेरो शायरी में उसे याद ही नहीं करती अपितु शब्द शब्द महसूसती भी है। यह कहानी समाज के भीतर फैले झूठ फरेब और अमानवीयता का जीता-जागता दस्तावेज है।
संग्रह की प्रतिनिधि कहानी “नियति का जंगल” एक खूबसूरत कहानी है । इसमें एक छोटी उम्र की लड़की की बहुत अच्छे घर में शादी हो जाती है । परंतु कुछ समय पश्चात उसका पति भांग के केस में दिल्ली में पकड़ा जाता है और उसे सजा हो जाती है उसके साथ एक और लड़की पकड़ी जाती है जिसके साथ उसके अवैध संबंध बताए जाते हैं। बस यहीं से वह लड़की मानसिक तनाव में आ जाती है और फिर एक दिन घर के नेपाली नौकर के साथ भाग जाती है। फिर एक दिन वह गोरखा नौकर उसे छोड़कर नेपाल जाने की बात करता है और जल्दी वापस आ जाऊंगा कहकर उसे छोड़ जाता है ।
वह कई दिनों तक उसके आने का इंतजार करती है परंतु वह मुड़कर नहीं आता है। यहीं उसकी नियति का प्रारंभ होता है।
वह मायके आती है परंतु मायके में उसे गांव में देवता जाने की मनाही कर देता है और उसे गांव के बाहर ही रहने की इजाजत देता है। फिर वह गांव के बाहर रहकर ही अपना पूरा जीवन यापन जंगलों से घास लड़कियां व जड़ी बूटियां लाकर करती है। इस कहानी को इतने सलीके से बुना गया है कि कहानी पढ़ते हुए पाठक भीतर तक डूब जाता है। यह कहानी संग्रह की सर्वोत्तम कहानी है।
इन कहानियों के साथ-साथ ‘पिंजरा, हक , कोहरे से लड़ती धूप, कच्चे धागे ,सारांश, महाकुंभ, सुलगती धूप और कुरूप कहानियां भी एक से बढ़कर एक व पठनीय हैं।
समाज मैं व्याप्त विसंगतियों का सूक्ष्म अवलोकन करती ये कहानियां अपने आप में अद्वितीय हैं।
अंत में सभी कहानियों की कथावस्तु बड़ी सलीके से बुनी गई है कहीं भी बनावटीपन का आभास नहीं होता। सभी कहानियां यथार्थ के आसपास बुनी गई हैं।
प्रत्येक कहानी पहाड़ी नदी की तरह अपना रास्ता बनाती हुई खुद आगे बढ़ती है। सभी कहानियां हिमाचल के गांवों का दर्शन करवाती हुई वातावरण निर्माण करती हैं।
सभी कहानियों के पात्र समाज के विभिन्न वर्गों से लिए गए हैं।
ये पात्र समाज के मनोविज्ञान, समाज के भीतर की खूबियों खामियों से सींचे हुए हैं।
पात्रानुकूल भाषा एवं संवाद कहीं भी पाठक के तारतम्य को बाधित नहीं करते हैं।
संक्षिप्त सरल तथा सहज संवाद कहानियों में जान डालने का काम करते हैं।
और अंत में ,कहानीकार को समाज के सूक्ष्म अवलोकन में महारत् हासिल है । लोक के मनोविज्ञान एवं रूढ़ियों, कुरीतियों , रीति-रिवाजों का कहानीकार को अच्छा खासा ज्ञान है,तभी तो हरेक कहानी लोक को साथ लेकर चलती है।
कहानियां लोक-यथार्थ को कहीं भी नहीं छोड़तीं और ओढ़ा हुआ यथार्थ भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। यही कहानियों की खूबसूरती भी है और सफलता भी। कहानियां अपने कहन में पूर्णतया सफल हुई हैं । उपमा की बात हो ,अर्थगौरव की बात हो या पदलालित्य की ,कहानीकार ने यथास्थान बखूबी इनका प्रयोग किया है जिससे कहानियां जीवंत बन पड़ी हैं । इस खूबसूरत संग्रह को साहित्य – जगत में जरूर गरिमापूर्ण स्थान मिलेगा। इसी शुभकामना के साथ कहानीकार आदरणीय अर्पणा धीमान जी को इस खूबसूरत संग्रह के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं। यूं ही उनकी लेखनी से समाज सापेक्षता एवं संवेदना संवर्धन होता रहे ,यही दुआ है।
पुस्तक समीक्षा –अशोक दर्द
पुस्तक —नियति का जंगल
कहानीकार —अर्पणा धीमान
गांव व डाकघर बैहना( बल्ह घाटी) बरास्ता गागल, जिला मंडी हिमाचल प्रदेश – 1 75006
कुल पृष्ठ -155
मूल्य ₹400
प्रकाशक —साहित्य संस्थान ई 10/ 666 उत्तरांचल कॉलोनी लोनी बॉर्डर , गाजियाबाद 201102
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