ऐसी औरतें
मेरी समझ से थोड़ी परे हैं
ऐसी औरतें,
जो औरत होकर
दूसरी औरत को नीचा दिखाती हैं।
जो बिना मजबूरी समझे उनके दामन पर दाग लगाती हैं।
जो बिना बात के बाते बनाती हैं,
जो गली, मौहल्ले, दहलीज, चबूतरों पर चुगलियां या बुराईयां करती पाई जाती हैं।
सच, मेरी समझ से थोड़ी परे हैं
ऐसी औरतें,
जो औरत होकर
दूसरी औरत को नीचा दिखाती हैं।
कुछ औरतों को तो मैंने आंकलन
करते देखा है,
ये कामकाजी महिलाओं को मजबूर या कमतर बताती हैं,
ये उन्हें उनके पहनावे, उनके रहन-सहन से आंकती हैं,
और खुद को उनसे बेहतर बताती हैं।
सच, मेरी समझ से थोड़ी परे हैं
ऐसी औरतें,
जो औरत होकर
दूसरी औरत को नीचा दिखाती हैं।
किसके घर में क्या है,
किसके पास कितना पैसा है।
कौन किससे जुड़ा है,
किसके दोस्तों का घेरा कितना बड़ा है।
ये सब इनके ज्ञानी दिमाग को पता होता है,
इनका आधा जीवन केवल
दूसरों के जीवन की तांका झांकी में व्यतीत होता है।
कोई इनसे जीवन की उपलब्धि पूछे
तो ये अपना अमीर पति और बच्चे दिखाती हैं।
इनकी तमाम ख्वाहिशें पूरी होती हैं
बस यही सोचकर इतराती हैं।
सच, मेरी समझ से थोड़ी परे हैं
ऐसी औरतें,
जो औरत होकर
दूसरी औरत को नीचा दिखाती हैं।
— अंकिता जैन
