बद्दुआ
कोई ऐसी दवा ले आओ,
जो मेरे सारे दुख हर ले,
दर्द को बढ़ाए नहीं—
बस चुपचाप उसे थाम ले।
कोई ऐसा स्वाद चखा दो,
जो बचपन में ठहर जाए,
जहाँ बीमारी का नाम भी
मुँह को विषैला न कर पाए।
कोई ऐसा मरहम दे देना,
जो ज़ख़्मों से बातें कर ले,
कि चुभन भी माफी माँग ले
दर्द भी खुद से शर्मिंदा हो जाए।
लोग डरते हैं काली ज़ुबान से,
काली हुई वो मेरी कीमोथेरेपी से
सच्ची कहानी है ये बद्दुआ नहीं,
बस ज़िंदा रहने की कीमत है।
अब चलना भी एक सवाल है,
हर क़दम थका-सा लगता है,
तलवों की चमड़ी उतर चुकी,
रास्ता भी अब मुझसे लड़ता है।
जो कल तक सहारा थे मेरे,
आज दो बोल भी नहीं कहते,
भीड़ बहुत है चारों ओर,
पर अपने कहीं दिखते नहीं।
मरहम अब असर नहीं करती
न दुआ, न दवा काम आ रही,
बस इतना कर दे कोई,
मेरे हालात को देख कर
नज़रें न चुराए अब….!!
— मुनीष भाटिया
