ख़ामोश अकेलापन
सन्नाटे की छाया,
पतझड़ पत्तों की तरह,
अकेले कदम चलते।
चाँदनी रात में,
साया भी कहता है,
कौन सुनता है दिल की।
हवाओं की सरसराहट,
कानों में गूँजती है,
बिना शब्द की पुकार।
सागर की लहरें,
सुनसान तट पर रोती,
मेरे मन के संग।
दीवारों के भीतर,
छिपा हुआ दर्द मेरा,
आँखों से बयाँ।
साँझ की धुंध में,
अजनबी भी दोस्त लगे,
तन्हाई की राहत।
फूलों की खुशबू भी,
मेरे पास आकर,
चुप्प रहना सिखाती।
सितारों की चमक,
अकेलेपन की राह,
रोशनी का संदेश।
पर्वतों की ऊँचाई,
मौन में गूँजती,
मेरी सोच की आवाज।
सर्द हवा का झोंका,
कांपती शाखों में,
दिल को छू जाता।
ख़ामोश अकेलापन,
सिखाता है धैर्य,
और खुद से मिलने का।
— डॉ. अशोक
