कविता

बद्दुआ

कोई ऐसी दवा ले आओ,
जो मेरे सारे दुख हर ले,
दर्द को बढ़ाए नहीं—
बस चुपचाप उसे थाम ले।

कोई ऐसा स्वाद चखा दो,
जो बचपन में ठहर जाए,
जहाँ बीमारी का नाम भी
मुँह को विषैला न कर पाए।

कोई ऐसा मरहम दे देना,
जो ज़ख़्मों से बातें कर ले,
कि चुभन भी माफी माँग ले
दर्द भी खुद से शर्मिंदा हो जाए।

लोग डरते हैं काली ज़ुबान से,
काली हुई वो मेरी कीमोथेरेपी से
सच्ची कहानी है ये बद्दुआ नहीं,
बस ज़िंदा रहने की कीमत है।

अब चलना भी एक सवाल है,
हर क़दम थका-सा लगता है,
तलवों की चमड़ी उतर चुकी,
रास्ता भी अब मुझसे लड़ता है।

जो कल तक सहारा थे मेरे,
आज दो बोल भी नहीं कहते,
भीड़ बहुत है चारों ओर,
पर अपने कहीं दिखते नहीं।

मरहम अब असर नहीं करती
न दुआ, न दवा काम आ रही,
बस इतना कर दे कोई,
मेरे हालात को देख कर
नज़रें न चुराए अब….!!

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com