हे प्रिये !
हे प्रिये!
प्रेम कितना सुंदर है
इसमें मृत्यु भी दुःख नहीं देती
कांटे फूल बन जाते हैं
और शैतान भगवान बन जाते हैं ।
हे प्रिये !
प्रेम वो मरहम है
जो बड़े से बड़े घाव को भर देता है
शत्रु को दोस्त बना देता है ।
हे प्रिये !
प्रेम ने पत्थर को पिघलाकर
पानी बना दिया
टूटी- फूटी झोपड़ियों में
महलों का सुख भर दिया।
हे प्रिये !
प्रेम कड़ी धूप में मीठी छाॅंव है
अनजानेपन में भी अपनापन है
हर मर्ज की दवा प्रेम है ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
