शिव स्वर
कैलाश से जब स्वर गूंजे,
मनुष्य का मन आनंदित हो जाए।
नीलकंठ बन दुख सह ले,
सबका जीवन दीपित हो जाए।
त्याग और समता की छाया,
सबके हृदय में उजियारा हो जाए।
मोह-माया से मन को छुड़ाएँ,
संतोष में हर दुख भुला जाए।
धर्म-जाति की दीवारें गिरें,
सत्य और करुणा सबमें बस जाए।
प्रकृति संग जीवन मुस्काए,
संतुलन से सृष्टि खिल जाए।
शिव के पथ पर कदम बढ़ाएँ,
मन और हृदय पूर्णतः शुद्ध हो जाए।
भक्ति और प्रेम से जीवन महकाएँ,
सारा जग इसी उजाले में नहाए।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
