कविता

बेरूखी क्यों

रह तो रहे हैं,
इसे घर कह तो रहे हैं,
पर घर में मकड़ियों का जाला है,
अव्यवस्थाओं का बोलबाला है,
कोई किसी को
अपने आगे कुछ समझ नहीं रहा है,
क्या तुम्हे नहीं लगता कि
अंदर ही अंदर कुछ सुलग नहीं रहा है,
सोच अलग हो सकता है,
विचार अलग हो सकता है,
पर अपनों के प्रति प्यार
क्या दिल में नहीं रहा या गए हो भूल,
इतने बड़े या इतने जिम्मेदार बन गए कि
अपने आप में हो चुके हो मशगूल,
परिवार के बीच रह रहे हो तो
अपनों के प्यार को चख,
सबको अपने स्वार्थ के हिसाब से न परख,
अब लग ही नहीं रहा कि
खून खून को पुकारता है,
मगर कैसा खून है
जिसका स्वार्थ चिंघाड़ता है,
जब अपनों के प्रति इतनी बेरूखी है तो
क्या खाक देश से प्यार दिखा पाओगे।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554