उँगली से छू लूँ आसमान
पापा की गोदी में बैठा मैं,
देखूँ नभ की शान,
छोटी उँगली ऊपर करके
पूछूँ उसका नाम।
“वो क्या है?” मैं हँसकर पूछूँ,
आँखों में है चमकार,
पापा बोले — “तारा होगा,
या उड़ता कोई विचार।”
पेड़ों से भी ऊँचा लगता
नीला-नीला गगन,
मन करता है छू ही लूँ मैं
बादल का आँचल धन।
पापा की गोदी है मेरी
सबसे प्यारी उड़ान,
उनके संग तो सच में लगता —
छू लूँ पूरा आसमान।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
