ग़ज़ल
है यह बुरी ही तो खबर दरबार के लिए ।
गद्दी नहीं कोई बची सरकार के लिए।।
दिल से मिले दिल देखते दीवानगी हुई।
मिलता मसाला ही गया सुन तो प्यार के लिए।
अब तो मिटेंगे हम तुम्हारे ही लिए अभी।
ज़िंदा रहेंगे हम सदा दीदार के लिए।।
हमने किया जो प्यार तो सुन छोड़ना नहीं।
अब तो रहेंगे साथ ही मनुहार के लिए।।
ज़ुल्मों-सितम हम तो सहे जाते अभी तलक।
तैयार हैं ख़बरें अभी अख़बार के लिए।।
जीते रहे अरमान पूरे कर सकें सभी।
दो दिल दिवाने हो गये हैं प्यार के लिए।।
अपने लिए ही अब सुन जीना हमें सदा।
सोचा बहुत था आज तक संसार के लिए।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
