कविता

ढूंढ रहा हूं

ढूंढ रहा हूं
खुद को खुद में
कतरा -कतरा जी रहा हूं
खुद को खुद में ।

उम्मीदों के सहारे
आगे बढ़ा रहा हूं
खुद को खुद में
भीतर- बाहर ढूंढ रहा हूं
खुद को खुद में ।

तिनका- तिनका हुई जिंदगी
दर्पण सा देख रहा हूं
खुद को खुद में
कुछ कहने की
कुछ सुनने की चाहत बाकी है
खुद को खुद में ।

अंत नहीं में
आशा भरा जीवन हूं
खुद को खुद में ।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111