कहानी

कहानी – मुझे तुम पर गर्व है बेबी

भाद्रो की तपती गर्मी, लूं की सनसनाती हवाएं, तो माघ की तपती सर्दी, कभी मौसम उनके कामों में आड़े नहीं आता! वो लहलहाते खेत देखते ही बनता। न कीसी के खाते ना खाने देते ! एक तरफ जहां वो जोड़े बैलों की देखभाल करते, वहीं बकरियों की जिम्मेदारी पत्नी विणा उठा लेती। पांच से आठ कियर जमीन मगर याद नहीं कभी बुवाई से लेकर कटाई तक कभी किसी बाहर वाले का सहारा लिया हो । बंसी लाल जी बहुत मेहनती और बहुत ही धैर्यवान थे। जीवन के इस पड़ाव तक कितनी ही बार प्राकृतिक आपदाओं ने फसलों को बुरी तरह दबोचा। लोगों ने उनमें कृषक हीनता की भावना भी जगाई लेकिन अपनी सहनशीलता पर वह अडिग रहे । यही गुण उनकी बेटी प्रिया में भी कूट-कूट कर भरी थी।
गेहुआ बदन, मध्यम कद, झील जैसी आंखें, झुकी नजरे, जिसने शायद कभी किसी के सामने आंखें उठाना ही न सीखा हो। स्वरों से रस टपकता, मासूमियत की मूरत, मानो विद्यालय से घर और घर से विद्यालय तो कभी खेतों की पगडंडियों तक, इतनी में ही सिमट जाती प्रिया की दिनचर्या!

देखते-देखते वह बड़ी होती गई। बंसीलाल जी भी थके हारे घर लौटते तो कब आंखें झपक जाती पता भी ना चलता। प्रिया की सारी जिम्मेदारी मां वीणा ही उठाती। जितनी भोली प्रिया थी उससे कहीं अधिक भोली उसकी मां! वीणा दुनिया से अनजान बेखबर अपने ही छोटी सी दुनिया में मस्त रहती।
देखते -देखते प्रिया दसवीं फिर 12वीं की परीक्षा में भी पास हो गई, लेकिन नंबरों ने मानो उसे धोखा दे दिया । परेशान माता-पिता लेकिन अनुसूचित जनजाति की गिनती ने उसका दाखिला एक मध्यमवर्गीय कॉलेज में करवा दिया। प्रिया अब वहां मन लगाकर पढ़ाई करती। हर दिन प्रातः घंटो सवारी का इंतजार करती, फिर कॉलेज पहुंचती।
सावन का महीना था। लगातार वर्षा अपना कहर मचा रहा था। प्रिया भी घड़ी की सूइयो पर बार-बार नजर दौड़ा रही थी । काटा तेजी से आगे भागता जा रहा था और इंतजार खत्म होने का नाम ही न ले रहा था। अचानक बारिश की मोटी मोटी बूंदें, एक नवयुवक छाते का सहारे लिए सामने आता हुआ, आप यह छत्री अभी ले लीजिए। मैं दुकान के अंदर चला जाता हूं।
अरे नहीं, बस मैं ठीक हूं प्रिया ने झट से उतर दिया ।
“ले लीजिए, आप पूरी गीली हो जाएगी। “नवयुवक ने दोबारा आवेदन करते हुए कहा। वैसे जाना कहां है आपको?युवक ने जानने की इच्छा व्यक्त की ।
“कॉलेज “प्रिया ने एक शब्द में कहा।
“कौन सी कॉलेज “वैसे तो आपको रोज ही देखता हूं लेकिन कभी पूछा नहीं…..।युवक ने जानना चाहा। “सियाराम गर्ल्स कॉलेज “प्रिया ने पुनः संक्षेप में ही उतर दिया।
“अच्छी कॉलेज है वह” नवयुवक ने तारीफ के तौर पर यह कहा। मानो वह बहुत कुछ कहना चाहता था लेकिन प्रिया की मौनता ने उसे कुछ कहने का मौका नहीं दिया। मासूम चेहरा, नीची निगाहें, बात करने का अंदाज, पूरे दिन दफ्तर में वही सोचता रहा।
अगली सुबह फिर दोनों वही बस अड्डे पर बस का इंतजार करते हुए। नव युवक मन ही मन ख्याली पुलाव पकाता रहा। वो कल छत्री वाला ….रहीम !
कब से इंतजार कर रहा हूं आपका, मतलब बस का…. लड़खड़ाते होंठों से।
“बुरा न मानें तो आपका नाम जान सकता हूं “रहीम ने जानने की इच्छा जताई।
मैं प्रिया हूं।
“वाह अच्छा नाम है। “रहीम ने कहा।
सौभाग्य से बस में एक ही सीट खाली थी । मजबूरन प्रिया को भी उसी सीट पर बैठना पड़ा ।
“आपका लेट नहीं होगा?”रहीम ने पूछा
नहीं, सही टाइम है ये मेरे लिए ! अच्छा, आपका जॉब है क्या ? प्रिया ने जिज्ञासा प्रकट किया।
“हां- हां, यही सामने की कंपनी में मेरा जॉब है” कुछ लड़खड़ाते शब्दों में ।
ओके, प्रिया ने कुछ पल गंभीरता दिखाई ।
दोनों में बातें चलता रहा। प्रिया को भी 40 मिनट का एक साथ मिल गया। हर रोज यह सिलसिला चलता रहा। धीरे-धीरे बातें भी बढ़ती गई। इधर-उधर की बातों के साथ रहीम भी अपनेपन का चादर बढ़ाता गया, जिससे दोनों के बीच हर तरह की बातें भी हो जाता। अब तो रहीम कुछ ना कुछ बहाना कर संध्या लौटते हुए भी प्रिया का साथ हो आता।
अचानक एक दिन रहीम ने बस अड्डे पर चाय पीने की इच्छा जताई। प्रिया ने विलंबता का झांसा दे इनकार भी करना चाहा लेकिन मन की इच्छाओं से वह भी पिघल चुकी थी । अब चाय पानी का सिलसिला भी हर दूसरे दिन हो ही जाता।घंटो फोन पर बात भी हो जाती। बातों ही बातों मे प्रिया ने अगले दिन अपनी जन्मदिन की बात बता दी । रहीम ने भी होटल के कमरे में बड़े ही भव्यता से जन्मदिन की तैयारी की।। कॉलेज की बहाने प्रिया भी वहां पहुंची। कमरे की भव्यता और सुंदरता देख —
“वाव अमेजिंग ! What’s a surprise?! इतनी जल्दी इतना सब कुछ! प्रिया ने चौकते हुए स्वर में कहा।
Yes dear,
यह तो कुछ भी नहीं, और तुमसे तो काम ही सुंदर है। रहीम ने कहा।

“ऐसा नहीं है सचमुच बहुत ही सुंदर सजाया है तुमने। लेकिन इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी? “प्रिया ने कुछ गंभीरता से कहा।
“अरे, यह तो कुछ भी नहीं तुम्हारे लिए तो मैं कुछ भी कर सकता हूं ।”रहीम ने मधुर स्वर में कहा।
रहीम! तुम भी न… प्रिया ने हाथ थामते हुए यह बात कही।
दोनों ने जन्मदिन का मजा उठाया। दोनों एक दूसरे को केक खिलाकर खूब मौज- मस्ती किये। थैंक्स रहीम आज मेरे इस दिन को इतनी यादगार बनाने के लिए! सचमुच आज तक मेरा जन्मदिन किसी ने नहीं मानाया। प्रिया ने एहसान जताते हुए खुशी जताई ।
प्रिया तुम मेरी अपनी जिंदगी से भी बढ़कर हो। बीच बीच यादो को समेटने का चलन भी चलता रहा । भावनाओं के सागर में डूबे दोनों आगे बढ़ते गए।
रहीम 15 बज गए, घर चलना होगा। ना चाहते हुए भी दोनों अपने- अपने घर को निकल गए । यादों की बारात समेटे प्रिया को घर पहुंचे देख —
बेटा, आपके कपड़े मे क्या लगा है? मां ने पूछा।
हां मां, वो बेंची में कुछ ….शब्दों के लीपा -पोती ने प्रिया को सवालों से बचा लिया, और वह कमरे की ओर बढ़ गई।
करीब सात बजने ही वाला था । हर दिन की तरह रहीम आज भी अपने दोस्तों के साथ मौज -मस्ती के लिए निकल पड़ा।झुमता गाता फुल जैसा खिला चेहरा और बढ़ता तेज देख —
“रहीम क्या बात है, आजकल बड़े खुश रहते हो और आज तो कुछ कहना ही नहीं है ! ” चेहरे की तेज और खुशी देख दोस्तों ने जिज्ञासा प्रकट की।
“बताओ ना “एक अन्य मित्र ने कहा।
“लगता है, हमारे रहीम भाई को किसी से प्यार हो गया है। अब्दुल ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा।
चेहरे की चमक तो वही कह रही है, अन्य मित्र ने उकसाया।रहीम पहले तो ना कारता रहा, लंबी सांस लेकर, हां मुझे किसी से प्यार हो गया है।
“किससे, कौन है हमारे भाई की रानी”जरा हम भी तो देखें । चौकन्ने भरे स्वर में सब ने पूछा।
बोतलों की मस्ती बढ़ती ही गई। रहीम ने भी नशे की हालत में मोबाइल आगे बढ़ाते हुए प्रिया की तस्वीर सामने किया। उसका मासूम चेहरा सबकी निगाहों में बस गया । तारीफों की पुल बनने लगे। कहां मिली तुझे ऐसी छोरी ? हमें तो मिलती ही नहीं ! अब्दुल्ला ने दुख एवं व्यंग्य दोनों ही जताते हुए कहा।
सचमुच, स्कूल के दिनों में ही मिलती थी, अब तो कोई नजरे ही नहीं उठाती। पता नहीं, कब ऐसी सुंदरियों के हमारे दर्शन होंगे । अब्दुल्ला ने इर्ष्या के स्वर में कहा।
सभी नशे में धूर्त कुछ भी बोलते रहे । रहीम भी दोनों के बीच की मसाले दार बातें भी बताता रहा ।
“अरे रहीम, हमें भी तो मिलवाना कभी हमारी भाभी श्री से!”अन्य मित्रों ने कहा।
“कौन सा तू उससे शादी करने वाला है । ” मित्र अब्दुल्ला ने झट से कहा।
“पता नहीं , मगर वो कोई खिलौना थोड़ी है, वह किसी से बात ही नहीं करती।” रहीम ने गंभीर स्वर में कहा।
“अब्दुला का मन ही मन मिलने के इच्छा बढ़ती गई। हर दिन वह उसकी बातें छेड़ता ‌। एक दिन उसने रहीम की मोबाइल से नंबर ट्रेस कर लिया। अब्दुल्ला प्रिया से बात भी करना चाहा लेकिन उसके आना कानी देख वह मौन हो जाता।
एक आध स्ट्रीट लाइट भी जल चुकी थी। एक दिन आज अब्दुल्ला ने रहीम का वास्ता देकर प्रिया से बात करना चाहा। करीब सात बजने वाला था। अब्दुल्ला ने रहीम की तबीयत का वास्ता देकर प्रिया को खेतों की पगडंडियों पर बुलाया। उसने पहले तो आने से इनकार किया लेकिन रहीम का नाम आते ही वह खुद को रोक न पाई। वह छिप- छिपा कर कमरे से बाहर पगडंडियों तक पहुंचीं । वहां अब्दुल्ला को अकेले देख हक्की- बककी रह गई।
तुम यहां अकेले ! रहीम कहां है ? प्रिया ने गुर्राते हुए स्वर में पूछा।
रहीम रेस्टोरेंट में तुम्हारा इंतजार कर रहा है।एक्चुअली उसके पैरों में बहुत दर्द था इसलिए वह आज काम पर भी नहीं गया, अभी मुझे तुम्हें लेने के लिए यहां भेजा है। अब्दुला ने बड़ी सफाई से प्रिया को समझाया ।
कहां है रहीम? रेस्ट्रो पहुंच प्रिया ने पुनः गुर्राते हुए पूछा।
चलो तो मेरे साथ, फर्स्ट फ्लोर में रूम नंबर 301 में वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है। अब्दुला ने कहा।
रहीम का प्यार उसे आगे बढ़ाता जा रहा था। कमरा नंबर 301 ।
तुम अंदर जाओ, रहीम तुम्हारा कब से इंतजार कर रहा है । अब्दुल्ला ने कहा।
अंदर प्रवेश करते ही, अरे यहां तो कोई नहीं! रहीम कहां है ? प्रिया ने जोर लगाते हुए पूछा । “
“अरे डार्लिंग मैं हूं ना तुम्हारा रहीम।”अब्दुल्ला ने फुसलाते हुए कहा।
“सच बताओ, मेरा रहीम कहां है ? तुम उसे बुलाते क्यों नहीं? रहीम, रहीम…
प्रिया ने जोर की आवाज लगाई ।
अरे छोरी, ज़्यादा मत चिल्ला, वरन्.. अब्दुल्ला ने धमकी भरे स्वर में कहा।
“वरन्… क्या कर लोगे तुम! “प्रिया ने कहा
कट “पुलिस को बुलाओगी, मगर कैसे? क्या बोलोगी! रहीम ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा ।
“अपने आप को टटोलते हुए, अरे मेरा मोबाइल….”प्रिया चौक पड़ी।
“अब क्या करोगी तुम, पता तो चले तुम्हारे पंख कितने बड़े हैं आखिर! ” तस्वीरों को आगे करते हुए, वैसे यदि मैं इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दूं तो ….. अब्दुल्ला ने तंत कसते हुए धमकी भरे स्वर में कहा।
“चेहरे की हवाइयां उड़ा देख ….. अरे डरो मत, वह तो मैंने बस यूं ही थोड़ा….. वैसे मैं भी इज्जत दार घराने का हूं… ।”क्या हम यूं ही थोड़ा….. अब्दुल्ला ने खुद को संभालते हुए कहा”
नहीं, प्रिया ने झट जोर से उत्तर दिया।
( गुस्से से लाल पीला)
अब्दुल्ला ने रुमाल में लगी गैस को प्रिया के नाको तले दबा दिया। वह चित होकर विछावन पर गिर पड़ी। फिर क्या था, अब्दुल्ला ने अपने मन की सारी हवस पूरी कर ली।
प्रिया की हल्की होश आते ही वह अपने घर को निकल चुका था।
सहमी घबराई प्रिया होश आते ही दो पल तो वह मौन हो अपने आप में शक फकाई रही। दौडी- भागी डरी सहमी आंसूओं को समेटे घर पहुंची। मां के सवालों में भी फंसी।
अरे, वह तो मैं निशा के घर नोट्स के लिए चली गई थी, , तो थोड़ी देर हो गई। मां के सवालों का लिपा- पोती करते हुए फोन भी घर पर था, इसलिए बता नहीं पाई। इतना कहते हुए प्रिया कमरे की ओर आगे बढ़ गई।
“आगे से ख्याल रखना, मां ने धमक भरे स्वर में कहा।”प्रिया कमरे में पहुंच एक तरफ आंसुओं की गंगा तो दूसरी तरफ मौनता से अपने आप को निहारती रही। ज्यों ही उसने रहीम को फोन लगा, कुछ कहना चाहा ही था कि —
“प्रिया, मैं सोच भी नहीं सकता तुम मेरे साथ ऐसा करोगी ? मेरे ही मित्र के साथ, उफ़ …छी… मुझे तो शर्म आती है, तुम्हें अपना कहने में! “रहीम ने घृणा भरे स्वर में कहा।
प्रिया पलट कर कुछ कह पाती, इतना कहते ही उसने धमाक से फोन काट दिया।
प्रिया पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वह अपने आप को कोसती रही । मां थोड़ा बहुत समझी भी लेकिन प्रिया अक्सर लिपा- पोती कर आगे निकल जाती ।
अब उसकी तबीयत भी बिगड़ी, लेकिन कुल मिलाकर प्रिया ने अपने आप को पुनः कॉलेज जाने के लिए तैयार कर लिया।
अब बस अड्डे पर रहीम दिखता भी तो बिल्कुल अनजाना सा !
प्रिया को भी इस पूरी प्रजाति से मानो घृणा सा महसूस होता। मां पिता अक्सर उसके विवाह की बात छेडते भी, तो प्रिया साफ तौर पर इनकार कर देती। माता के लाख समझाने पर भी वह विवाह के लिए नाकारती रही, और अचानक एक दिन दिल के दौरे ने परिवार का कमर तोड़ दिया। पूरे वर्ष लहलहाने वाला खेत मानो अब बंजर पड़ा रहता।
प्रिया अब पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी की तलाश में भी लग गई। शुरू में तो वह छोटे-छोटे कार्यों द्वारा अपने जीवन चर्या निकाल लेती, वहां भी उसे पुरुषों से बात करने में बड़ी तकलीफ होती लेकिन मजबूरी का नाम जिंदगी है। यही मान कारवा आगे बढ़ाती रही। बी ए, की परीक्षा, नौकरी फिर एलएलबी की पढ़ाई, सारी आपदाओं से वह घिरी रही। वकालत की पढ़ाई पूरी हुई, लेकिन नंबरों ने उसका पुनः साथ नही दिया। जिसके कारण उसे ऑल इंडिया बार के परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिली । दुखी परेशान प्रिया अपने आप से लड़ती रही। इधर-उधर से जानकारी इकट्ठा करते हुए परेशान प्रिया असिस्टेंट बोर्ड अधिकारी श्रीमान शिवाजी लाल जी के पास पहुंची।
बाहर गेटकीपर को देख “भैया मुझे शिवाजी लाल सर से मिलना है। प्लीज कोई रास्ता निकाल दीजिए “। प्रिया ने आवेदन करते हुए कहा।
“बहन, मगर आज संडे है, आज वह किसी से नहीं मिलते। “गेट कीपर ने बड़ी ही विनम्रता से कहा।
” मगर क्यों भैया, कल मेरे पास वक्त नहीं है । कल से ही मेरा परिक्षा शुरू हो रहा है। प्लीज, एक बार मेरे लिए उनसे बात करके देखिए। मेरा उनसे मिलना बहुत जरूरी है। “प्रिया ने भावुकता भरे स्वर से कहा।
“ओके, मैं उनको बोल कर देखता हूं।”
गेटकीपर ने अंदर जाकर ज्यों ही सूचना दिया। क्या तुम नहीं जानते आज मैं किसी से नहीं मिलता। लाल जी ने रोष जताते हुए कहा ।
सर मैं जानता हूं, लेकिन उसकी मजबूरी और चेहरे की मासूमियत देख सोचा आपसे एक बार पूछ लेता हूं”। गेटकीपर दो पल वहीं खड़ा रहा।
जाओ, थोड़ा गेस्ट रूम ठीक कर दो । लाल जी ने आदेश दिया।
सर अंदर भेज दूं, दो पल थम कर गेट कीपर ने पूछा।
हां लाल साहब ने आदेश दिया।
जाइए, सर ने बुलाया है आपको । हां मगर थोड़ा संभल कर ! ( हिदायत के तौर पर गेट कीपर ने कहा )
कुछ कहा आपने? प्रिया ने पलटकर पूछा,
नहीं- नहीं कुछ नहीं।
१ (अंदर प्रवेश कर)
“गुड मॉर्निंग सर “
गुड मॉर्निंग…
“कहिए, क्या काम था मुझसे, क्या सेवा चाहिए मेरी? लाल जी ने जिज्ञासा प्रकट की।
सर वह एक्चुअली मुझे ऐबAIBE के परीक्षा में बैठना है, लेकिन एलिजिबिलिटी टेस्ट में मेरे कट आफ से बीस नंबर कम आए हैं, इसलिए मैं आपके पास….. प्लीज सर, I know, यदि आप चाहे तो यह संभव करा सकते हैं। प्रिया ने बड़े ही गंभीर स्वर में आवेदन कर कहा।
लाल जी सोचते रहे, उनकी एक नजर कागजों पर तो दूसरी नजर प्रिया को निहारती रही । प्रिया भी ऊपर वाले से दुआ मांगती रही ।
काम तो हो जाएगा लेकिन मुझे थोड़ा वक्त चाहिए। लाल साहब ने सोचते हुए कहा।
“सर परीक्षा तो कल ही है” प्रिया ने बताया।
“Yes I know, थोड़ा वक्त, कुछ यही एक डेढ़ घंटे…” लाल साहब ने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा।
“ओके सर, मैं बाहर इंतजार कर लेती हूं “, प्रिया ने झट से कहा।
आप यही रहिए, कोई बात नहीं! प्रिया अपने मोबाइल पर नजरे गडाई ही थी कि पूरी नेटवर्क उड़ गई, रोशनी ने भी साथ निभाना छोड़ दिया। प्रिया भौचक्की रह गई!
“क्या हुआ? ” लाल साहब ने पूछा
“नहीं सर, कुछ नहीं, लेकिन अचानक बिजली, मोबाइल दोनों कैसे गायब हो गया? प्रिया ने गंभीर सहमे शब्दों में कहा।
“वह मैंने किया”!, लाल साहब ने कहा।
“मगर क्यों सर ?” प्रिया ने सहमे शब्दों में पुछा।
वह मन ही मन सब कुछ समझ रही थी । लाल साहब प्रिया के किनारे सोफे पर आ बैठे । हाथों में कलम लिए …बदले में मुझे क्या मिलेगा। लाल साहब ने जानना चाहा।
“सर, मैं आप जैसे बड़े लोगों को क्या दे सकती हूं”! प्रिया ने नग्न स्वर में कहा।
“अरे प्रिया, ऐसी बात नहीं है, तुम्हारे पास तो सब कुछ है । पूरे जहां की खुशियां है, बल्कि तुम तो स्वयं ही एक खुशी हो ! लाल साहब ने बहलाते हुए कहा ।
” प्रिया सब कुछ समझ चुकी थी । लंबी सांस लेकर … तो आपको मेरी…”
“हां “, लाल साहब ने कहा।
“सर, पहले साइन कर दीजिए “प्रिया ने आग्रह किया ।
“नहीं, सर पहले काम। “
“ओके, सर सीसीटीवी ऑफ कर दीजिए प्लीज, ” उबलते रक्त प्रवाह को संभाल अपने आप को तैयार करते हुए गुजारिश की।
“यस यस, जरुर बेबी! प्लीज कम इन माई बेडरूम।”लाल साहब ने कहा।
डरी सहमी अपने आप में कराहती हुई वह कमरे तक पहुंची ।
प्लीज सिट, कैसी लगी मेरी बेडरूम! लाल साहब ने पूछा।
” सर बहुत अच्छी है”।
“चलो, अब ज्यादा टाइम वेस्ट नहीं करते हैं, तुम्हें भी पढ़ाई करना होगा। “साहब ने कहा।
सर, करना क्या है ? पूरी तरह आश्वस्त कर, प्रिया ने दिल पर पत्थर रखते हुए कहा।
नजरे झुकाए, वही गुमसुम बैठी रही। हल्के स्पर्श ने ही लाल साहब का रक्त प्रवाह बढ़ाता जा रहा था।
तुम भी कुछ करो ना, प्रिया जिंदा लाश बन वही पड़ी रही। लाल साहब ने लिटा कर अपनी हवस पूरी कर ली। चित्त पड़ी प्रिया सब कुछ महसूस कर रही थी ।
“सर हो गया। “प्रिया ने सवाल किया।
“हां, कैसा लगा तुम्हें, बताया नहीं तुमने ? “लाल साहब ने पूछा।
मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा। वर्षों बाद मुझे यह खुशी मिली। … कैसे लगा तुम्हें! लाल साहब ने अपनी मन की बात बताया।
“सर बहुत अच्छा, अब साइन कर दीजिए प्लीज, ।वह दर्द भरे स्वर में आवेदन की “
हां बेबी, बहुत-बहुत धन्यवाद तुम्हारा , पत्नी के जाने के बाद आज पहली बार तुमसे मुझे यह खुशी मिली । भगवान तुम्हारा भला करें। लाल साहब ने हस्ताक्षर कर सर्टिफिकेट आगे बढ़ाया।
प्रिया लंबी सांस ले नजरे झुकाए वहां से बाहर निकली। सवालों के भंवर लिए समाज एवं परिस्थितियों की मजबूरी समेटे प्रिया घर पहुंच लैपटॉप में लाल साहब के हस्ताक्षर अपडेट करते ही परीक्षा के अनुमति मिल गई । आंसुओं से दामन समेटे परीक्षा में उपस्थिति फिर महीनो बाद परिणामो ने प्रिया और मां को असीम खुशियां दी।
प्रिया अब जाने-माने वकील के साथ असिस्टेंट के पद पर कार्यभार संभालने लगी । बेटी को देख मां का सिना गर्व से चौड़ा हो जाता। बातों ही बातों में वह अक्सर कह भी देती
” बेटी हो तो प्रिया जैसी”
लेकिन विवाह की बात करते ही वह बिल्कुल कनखी काट लेती और साफ इनकार कर देती । वह प्रतिदिन कोर्ट पहुंचती और सीनियर वकील के साथ हर आने – जाने वाले की पहलुओं को समझती।
उधर मौसम का मिजाज बदल रहा था। सर्दियां अपना कहर ढा रहा थी । इतराती बलखाती धूप के आंचल पर मेज – कुर्सी लगाए वकीलों का झुंड गर्माहट की अपेक्षा लिए आनंद लें रहे थे।
इतने में एक अधवृद्ब जोड़ी वरिष्ठ वकील के पास– सर मुझे एक केस लिखवाना हैं।
सभी के नज़रे एक टक निहारती ही रही। जैसे रात के अंधेरे में चांद को निहार रहे हो ।
बताइए क्या केस वकील साहब ने पूछा।
“सर रेप केस है “यह शब्द प्रिया के कानों तक पहुंचते ही उसके कान खड़े हो गए। एक तरफ माता-पिता की बात सुनती, तो दूसरी तरफ वकीलों के तथ्यों को बड़े ध्यान से सुनती रही।
मैं विस्तार से जानना चाहूंगा। वकील साहब ने कहा।
दोनों की तस्वीरों को आगे करते हुए रिया, और लड़के का नाम विजय था। माता-पिता ने चुप्पी साध ली।
“आखिर आपकी बेटी रात्रि नौ बजे अकेले एक पुरुष के घर गई ही क्यों थी? ” वकील साहब ने गंभीरता से पूछा।
सर ये दोनों काफी पुराने दोस्त थे। लेकिन उस रात के बाद से लड़के की कोई खबर नहीं। “मां ने दर्द भरे स्वर में कहा ।
इतनी रात को …वकील साहब ने चौक कर कहा।
दोस्त —एक लड़का और एक लड़की ! वह भी रात को नौ बजे? वकील साहब ने चौकते हुए स्वर में कहा। आप जैसे भोले -भाले माता- पिता के कारण ही आय दिन ऐसी घटनाएं होती है, और न जाने क्या-क्या बोलते रहे। इसी बीच अन्य वरिष्ठ अधिकारीयों के साथ लाल साहब भी समझाने से ना चुके । केस दर्ज कर आगे की कार्रवाई के लिए मोटी रकम सुन प्रिया के दिल पर सांप लोट गया। वह खुद को रोक न पाई।
सर इस तरह के कामों के लिए रात और दिन कोई मायने नहीं रखता, जिसने जब चाहा, जहां चाह, वहीं…. सभी वकील गण फटी आंखों से देखते रहे ।
सॉरी सर कुछ ज्यादा कहा हो तो…… प्रिया ने आवेदन किया।
लेकिन फिर भी सावधानी, सुरक्षा भी तो कोई चीज होती है, रात 9:00 बजे अकेली युवा लड़की एक युवा लड़के के घर जाकर नोट्स ले ….यह तो “आ बैल मुझे मार “वाली कहानी है। पिता ने शिकायती पत्र और पचास हजार के चेक आगे करते हुए …….सर प्लीज, मेरी बेटी को इंसाफ दिला दीजिए। रोती गिड़गिड़ाती मां की ध्वनि पूरे माहौल में गूंज उठी।
प्रिया के चेहरे की शिकन, चुप्पी, रुका हुआ कलम देख, वकील बृजेश —क्या सोचने लगी तुम अचानक?
नहीं सर, मैं वो रिया के माता-पिता के बारे में सोच रही थी । कितने परेशान थे वो, और उस बेचारी रिया के क्या हाल हो रहे होगे! प्रिया ने दुख जताते हुए कहा।
अरे प्रिया, इतना नहीं सोचते, ये तो आय दिन की कहानी है । वकील बृजेश साहब एक टक निहारते रहे।
सर वही तो दुख की बात है, और कैसे ना सोचू ! यह तो मेरी स्वयं की आप बीती कहानी है। वह तो मेरे आंसुओं ने मेरे जख्मों को धो दिया और कानों -कान किसी को खबर तक न पहुंचने दिया और आज मैं यहां तक पहुंच पाई, वरन्……. प्रिया ने गंभीरता भरे स्वर में कहा।
“वरन्, ऐसा क्या हुआ था तुम्हारे साथ ! और तुमने अब तक शादी क्यों नहीं किया?” वकील बृजेश ने जिज्ञासा प्रकट की ।
“सर, मुझे इस जाति पर बिल्कुल विश्वास नहीं ।” प्रिया ने दो टुक में उतर दिया।
“किस जाति पर “?
“सर पुरुष जाति पर ! “मगर छोड़िए इन बातों को “रात गयी, बात गई” ! लंबी कहानी है आपसे भी मैंने पहली बार मजबूरी में ही बात किया था, मगर अब तो …..
“कल ही सर जैसे आपने कहा –नौ बजे अकेली लड़की…. तो सर मैं आपसे, एक पिता समान वरिष्ठ वकील से पूछना चाहती हूं कि हम लड़कियां अपने काम करे तो कब करें? ना दिन के उजाले में हम सुरक्षित हैं, ना रात के अंधेरे में ?:आखिर हम करें तो कब करें? महिलाओं को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी बनाने के लिए हर दिन न जाने कितने ही कानून बनाए जा रहे हैं, संस्थाएं खोली जा रही है, बड़ी-बड़ी बातें, मोटी-मोटी किताबें, घंटो नारी विमर्श की बातें की जा रही है, लेकिन असल जिंदगी में शून्य…..आखिर वो स्वावलंबी बने भी तो कैसे? इस मंजिल तक पहुंचने के लिए उसे न जाने कितना कुछ कुर्बान करना पड़ता है। हर ऊंचे पद पर भी उनका ही बसेरा होता है, और मंजिल तक पहुंचना मतलब खतरों से खेलना ….।
न जाने क्या कुछ कुर्बान करना पड़ता है । प्रिया ने बड़े ही गंभीरता से कहा।
“हां, तुम्हारी बात तो सही है लेकिन हर कोई एक जैसा नहीं होता ! “
सर, लेकिन जिसने इतनी छोटी सी जिंदगी में तीन-तीन बार धोखा खाया हो , वह और क्या बोल सकती है! बाकी सबको तो छोड़ दीजिए। वरिष्ठ वकील लाल साहब स्वयं… इतनी ऊंचे पद पर होकर भी “मौका में चौका “मारते नहीं चूकते । सर, मेरा आपसे एक रिक्वेस्ट है, मुझे “”आपराधिक बचाव वकील” खास कर औरतों के क्षेत्र में मुझे विशिष्ट बना दीजिए, जिससे हमारे देश में औरतों पर उठने वाले हाथों को सौ बार सोचना पड़े, और अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दिला सकूं। नारी धर्म को सार्थक कर सकू। प्रिया ने गुजारिश करते हुए अपने मन की सारी बात बृजेश सर को बताई।
जरूर बेटा, बृजेश भी अपने कामों से बचें समय में वह नारी संबंधी कानूनो की बारीकी से चर्चा करते । धीरे-धीरे अब वह छोटे-छोटे केसेस खुद ही सॉल्व करने लगी । वक्त के साथ ही वह “सीनियर लॉयर ऑफ वूमेन”की सूची में गीनी जाने लगी।
कोर्ट का माहौल था। पूरी तरह सन्नाटा छाया था। सीनियर वकीलों में वरिष्ठ गणों के साथ -साथ लाल साहब बृजेश सर सभी मौजूद थे। वहां प्रिया का आत्मविश्वास से भरा जोशिला आवाज, तो कानून की बारिकी का ज्ञान देख सभी चौंक पड़े। इतनी कम उम्र में इतनी बारीकी! प्रिया का स्वर पूरे कमरे में गूंज उठा । जज को प्रिया के पक्ष में फैसला देख लाल साहब ने —कंग्रॅजुलेशन बेटा ! मगर मुझे माफ करना।
सर माफी क्यों? आज आप ही के कारण मैं इतने सारे लड़कियों को इंसाफ दिलाने में सफल हो पाई हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका सर,
“मगर हां, क्या एक सेल्फी ले सकती हूं आपके साथ ? “
“जरूर बेटा, “लाल साहब ने कहा
“सर बेटा नहीं, बेबी! ” प्रिया ने व्यंग्य करते हुए कहा।
अधिकारी साहब चेहरा झुका कर । “मुझे तुम पर गर्व है बेबी”
लाल साहब और बृजेश सर दोनों के बीच में प्रिया कैमरे में कैद हो गई। तो सभी के मुख से एक ही स्वर निकला। “आई प्राउड ऑफ यू ” पूरा कोर्ट खुशी से लहलहा उठा।

— डोली शाह

*डोली शाह

1. नाम - श्रीमती डोली शाह 2. जन्मतिथि- 02 नवंबर 1982 संप्रति निवास स्थान -हैलाकंदी (असम के दक्षिणी छोर पर स्थित) वर्तमान में काव्य तथा लघु कथाएं लेखन में सक्रिय हू । 9. संपर्क सूत्र - निकट पी एच ई पोस्ट -सुल्तानी छोरा जिला -हैलाकंदी असम -788162 मोबाइल- 9395726158 10. ईमेल - shahdolly777@gmail.com