सामाजिक

दुर्भाग्यजनक है यह सब

धर्म-कर्म और समाज जीवन के विभिन्न रचनात्मक क्षेत्र में लगातार रमे रहकर ऊर्जा, समय और धन का व्यय करते रहने के बावजूद हमारे जीवन, घर-परिवार, समाज और स्थानीय परिवेश में अभाव, समस्याएं और अवसाद बरकरार रहते हैं, दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ता।

इन सबके लिए हम ही दोषी हैं जो कि हमारे कर्मयोग से जुड़े कई पहलुओं के सूक्ष्म तत्त्वों पर कोई चिन्तन नहीं करते। जैसा लोग करते आ रहे हैं, वैसा ही हम करते जा रहे हैं। भेड़चाल के मामले में नकलची बन्दरों को भी हमने बहुत पीछे छोड़ दिया है।

अंधानुकरण की आदत, है बड़ी घातक

मदारियों के इशारों पर नाचने-कूदने और मनोरंजन करने वाले बन्दर-भालुओं की तरह हम भी वह सब करते जा रहे हैं जो और लोग करते हैं। किसी को पता नहीं है कि इसका उद्देश्य क्या है, धर्म शास्त्रों में इस बारे में किन-किन मर्यादाओं का उल्लेख किया गया है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसकी समझ नहीं है। बस करते ही जा रहे हैं, इसलिए कि दूसरे लोग भी करते आ रहे हैं।

दिखावों में मरे जा रहे हैं

अब हमारे अधिकांश कर्म केवल फैशनी, चकाचौंधिया प्रदर्शन और दिखावे के होकर रह गए हैं जहां हम जो कुछ करते हैं वह लोगों को दिखाने के लिए। चाहे नाम और तस्वीरों की भूख शान्त करने सायास पब्लिसिटी बटोरने की बात हो या फिर सोशल मीडिया पर छाए रखने के लिए पोस्ट, सेल्फि, रील्स, स्टेटस, वीडियो और फोटो की।

नहीं आ पा रहा कोई बदलाव

हमारे कर्म से लेकर साधनों, संसाधनों, सेवाओं और सामग्री में शुचिता का उत्तरोत्तर अभाव होता जा रहा है। और यही कारण है कि हम बहुत कुछ करते हुए जा रहे हैं पर जहां थे वहीं ठहरे हुए हैं। केवल संतोष है तो इसी बात का कि कुछ कर रहे हैं।

धर्म के नाम पर उत्सवी मनोरंजन हावी

उत्सवी मनोरंजन के नाम पर कुछ घण्टों और कुछ-कुछ दिनों के आयोजन करते रहकर अपने आपको धार्मिक, सनातनी और भक्त सिद्ध करते हुए हमने पूरे के पूरे सनातन को चन्द मनोरंजनिया उत्सवों और भण्डारों, उपरणे ओढ़कर सम्मान पाने और प्रचार-प्रसार पाने तक में सिमट कर नज़रबन्द कर डाला है। और यह सब कुछ मौज उड़ाऊ आयेजन पराए पैसों से, चन्दा उगाही और धर्म के नाम पर बैंक बेलेन्स बढ़ाते हुए।

निर्माल्य दे रहा दुर्भाग्य

आजकल धार्मिक कथा-प्रवचनों से लेकर सामाजिक, राजनैतिक और साहित्यिक-साँस्कृतिक आयोजनों में मिथ्या सम्मान और यश प्राप्ति की तीव्र भूख मिटाने के लिए इसी तरह पुष्पहारों, उपरणों, दुपट्टों, शालों/पगड़ियों व साफे आदि का चलन चल पड़ा है। एक को पहनायी, उसने निकाल कर दूसरे को पहना दी। दोनों ही खुश। पर पता नहीं कि इस खुशी के पीछे उनकी कितनी सूक्ष्म हानि हो रही है।

कई मन्दिरों में पुजारी भगवान को पहनायी गई माला निकाल कर भक्तों के गले में डाल देते हैं और भक्त इसे भगवान का कृपा प्रसाद मानकर यह मानकर गद्गद् हो उठते हैं कि जैसे स्वर्ग में आलीशान भवन, सुविधाओं और सेवाओं के लिए अपना आरक्षण ही हो गया हो।

इसी तरह देवी-देवताओं की मूर्त्तियों पर चढ़े पुष्पों, बिल्वपत्रों आदि को आशका(आशीर्वाद) के रूप में भक्तों के हाथ में प्रदान कर दिया जाता है। जबकि यह सब निर्माल्य की श्रेणी में आता है। और भक्त इन्हें पाकर अपने आपको परम् सौभाग्यशाली अनुभव करते हुए फूले नहीं समाते। होना तो यह चाहिए कि निर्माल्य और उच्छिष्ट सामग्री के प्रयोग से बचें और सदैव ताजी सामग्री का ही प्रयोग करें। चाहे भगवान के लिए हो या अपने स्वयं के लिए।

पुष्पों की हो या कोई और माला, एक बार इसका उपयोग हो जाने पर दुबारा इनका प्रयोग नहीं होना चाहिए। भगवान को अर्पित कर दिया पुष्पहार उन्हीं भगवान विशेष का होता है, इसे वहाँ से हटाते ही यह निर्माल्य हो जाता है। इसी माला को हटाकर वापस उन्हीं को अथवा दूसरे देवी-देवता या व्यक्ति को पहना देना वर्जित है।

इसी प्रकार किसी भी संत/कथावाचक/श्रेष्ठीजन/स्वनामधन्य नेतागण, चन्दाप्रदाताओं, भामाशाहों या किसी भी किस्म के मनुष्य को पहनायी गई पुष्पमाला का दुबारा उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। अपने गले से बाहर निकाल दी गई माला भी निर्माल्य जैसी ही हो जाती है।

छिद्रदार होता जा रहा आभामण्डल

जो ऐसा करता है वह अहंकार को तो दर्शाता है ही, इस प्रकार अपने आभा मण्डल से पृथक कर उच्छिष्ट माला दूसरे को पहनाकर अपने पाप दूसरे के गले में डाल देता है और सामने वाला वज्र मूर्ख इसे सम्मान या आशीर्वाद समझ कर खुशी-खुशी पहन भी लेता है। उसे यह पता ही नहीं कि दुबारा माला पहनने का क्या प्रभाव पड़ता है व उसका आभा मण्डलीय सुरक्षा कवच कितना क्षीण हो रहा है।

किसी ओर की पहनी हुई माला हो या कपड़े अथवा और कोई सा आभूषण, श्रृंगार सामग्री आदि, इसमें अच्छे व्यक्ति की सकारात्मकता और बुरे व्यक्ति की नकारात्मकता का सूक्ष्म तत्त्व समाहित रहता ही है।

पापों का सहर्ष आयात

इसी प्रकार किसी भी प्रकार की सामान्य बीमारी अथवा असाध्य रोग हो, उसके अंशों का भी ट्रांसफर हो सकता है। यही नहीं तो किसी हिंसक, शराबी, व्यभिचारी, भ्रष्ट या दुष्ट व्यक्ति की पहनी हुई माला, कपड़े, आभूषण आदि को जो कोई पहनता है उसे उस पापी के पापों को शेयर करना पड़ता है।

गंध बताती है हकीकत

कई लोगों के शरीर से खराब आती रहती है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जिसके शरीर से दुर्गन्ध आती रहती है, वह मन-मस्तिष्क से मैला और शरीर से प्रदूषित है। इस दुर्गन्ध को छिपाने के लिए सेंट, इत्र आदि सुगंधित द्रव्यों का उपयोग करने की विवशता जिन्दगी भर बनी रहती है। ऐसे व्यक्तियों का सामीप्य और स्पर्श तथा इनके साथ बैठकर खान-पान या अन्य क्रियाओं का भयंकर दुष्परिणाम सामने आता है।

सामग्री की विशुद्धता सर्वोपरि

अतः अपने आभा मण्डल को स्वच्छ एवं पवित्र बनाये रखें व जीवन में इस प्रकार की सामग्री सदैव ताजी ही स्वीकारें ताकि किसी भी प्रकार की बाहरी मलीनता आपका स्पर्श न कर सके। यह बात सिर्फ पुष्पहार पर ही नहीं पगड़ी, साफा व शाल-दुपट्टों, परिधानों आदि सब पर भी लागू होती है।

सतर्क रहें

सूक्ष्म तत्त्वों का अनुसंधान करने वाले जानकारों के अनुसार जिस रंग के पुष्पहार, शॉल, पगड़ी, साफा, उपरणा, दुपट्टा, दुशाला, उपहार आदि हम स्वागत-सत्कार, सम्मान, अभिनन्दन एवं आतिथ्य परम्परा में प्राप्त करते हैं, उस रंग विशेष से संबंधित देवी-देवताओं, ग्रह-नक्षत्रों का अच्छा प्रभाव हम खो देते हैं।

इसका कालान्तर में हमारे शरीर, मन-मस्तिष्क और जीवन के साथ ही हमारे परिवार पर भी कुप्रभाव पड़ता है। लेकिन हम अपने आपको प्रतिष्ठित एवं वीआईपी या वीवीआईपी मानकर यह सब प्राप्त कर अपार खुशी जताते रहते हैं। जो हमें यह पहनाता है उसके ग्रह-नक्षत्र ठीक हो जाते हैं।

गंभीर चिन्तन जरूरी

तभी कहा जाता है कि जो ग्रह-नक्षत्र कमजोर हो, उनसे संबंधित द्रव्य दान कर देने से इनका अनिष्टकारी प्रभाव कम हो जाता है। इन तमाम विषयों के सूक्ष्म मर्म और प्रभावों पर विन्तन-मनन करते हुए इनके प्रति गंभीर रहने की आवश्यकता है।

— डॉ. दीपक आचार्य

*डॉ. दीपक आचार्य

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