शब्दों की सीमा
सन्नाटा गहरा,
अनकहे भाव छुपाए हैं,
मन बोले चुप।
हवा के झोंके,
कभी कहें तो कभी चुप,
संदेश लाए।
पानी की धारें,
धीरे-धीरे बहती जाएं,
शब्दों की सीमा।
चाँद की रोशनी,
अनकहे सपनों को छू जाए,
कहानी गढ़े।
फूलों की खुशबू,
बिन बोले सबकुछ कहे,
सहानुभूति दे।
सर्द हवा में,
कुछ बातें अधूरी रह जाएं,
मन में गूंजें।
सूरज की किरणें,
सुनहरे शब्द फैलाएं,
नया संदेश दें।
पत्तों की सरसराहट,
छुपी भावनाएँ बताए,
हर दिल छू जाए।
नदी की कल-कल,
अनकहे प्रेम का गीत,
शब्दों की सीमा।
चिड़ियों की चहचहाहट,
कभी बोलें तो कभी मौन,
सुख की गूँज।
शाम की ठंडी हवा,
अनकहे लम्हों की बात,
दिल को छू जाए।
रात की चांदनी,
मौन भावनाओं की छाया,
शब्दों की सीमा।
— डॉ. अशोक
